जून 2026

दस्तावेज़आयोजन : बीते हुए क्षणों की परिक्रमा     Posted: August 1, 2021

समय गतिवान है। हम इस बात से भली-भाँति परिचित है कि जो क्षण, जो मुकाम जीवन में एक बार गुज़र जाते हैं वो बीते हुए क्षण फिर वापस नहीं आ आते; लेकिन अक्सर किसी विशेष परिस्थिति अथवा मनः स्थिति में वही स्वर्णिम क्षण हमारी स्मृति में पुनः जीवंत हो उठते हैं। लेखन, चित्र अथवा फोटो और आजकल तो ऑडियो-वीडियो के ज़माने में हम इन कतिपय क्षणों की पुनः यात्रा कर पाते है, इन्हें फिर से महसूस कर पाते हैं। ‘आयोजन’ पुस्तक का ताज़ा प्रकाशन इस प्रकार के अनुभव को दर्शाता है। ‘आयोजन’ के शीर्षक को लेकर मन में उठी उथल-पुथल को शांत करने के लिए जब पृष्ठ पलटाए तो ज्ञात हुआ कि अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित लघुकथा सम्मेलनों/ गोष्ठियों की शृंखला में 11 फरवरी, वर्ष 1989 में बरेली में आयोजित गोष्ठी के दौरान लघुकथा-पाठ एवं विमर्श की पूरी रिकार्डिंग की गई थी और उसे ही अविकल रूप से प्रकाशित करने का प्रथम प्रयास इस पुस्तक के द्वितीय संस्करण के रूप में हमारे सम्मुख है। इस तरह से किसी आयोजन को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित करना वह भी द्वितीय संस्करण, यह आयोजन की सफलता तो है ही और अपने आप में एक अनूठी पहल है जिसके लिए संपादक द्वय बधाई के पात्र है |

सुकेश साहनी जी एवं रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी द्वारा संपादित 108 पृष्ठीय इस पुस्तक को क्रमशः तीन भागों में (1) प्रथम सत्र – स्वागतं व्याहरामी, लघुकथा-पाठ, विमर्श (2) द्वितीय सत्र –  लघुकथा-पाठ, विमर्श तथा (3) तृतीय सत्र – लघुकथा-पाठ में बाँटा गया है। ‘परिक्रमा’ शीर्षक से पुस्तक की भूमिका के रूप में संपादकों ने आयोजन के बारे में जानकारी देते हुए उन तिक्त एवं मधुर क्षणों की स्मृतियों, अनुभवों की अनेकानेक गंधों को लेखनबद्ध किया –

काँटों से घाव माना बहुत बार खाए हैं।

फूलों की खुशबू से भी हम ही नहाए हैं।। (हिमांशु)” (पृ. 8)

पुस्तक के फ्लैप पर डॉ. भगवान शरण भरद्वाज द्वारा दिए गए स्वागत भाषण का एक अंश दिया है, जिसमें लघुकथा के स्वरूप एवं महत्त्व के बारे में उपयोगी जानकारी दी गई        है। “……ठीक इसी प्रकार कोई कहानी अगर सिमट और सिकुड़ जाए, तो लघुकथा नहीं कहला सकती। उसकी लघुता नावक के तीरजैसी है, जिसका घाव गहरा होता है। वह एक समग्र, स्वयं पूर्ण मौलिक और स्वतंत्र साहित्य-विधा है। वह एक सम्पूर्ण व्यंजना है, किसी की छाया, प्रकृति, कटा-छँटा या बौना संस्करण नहीं। उसका आकार-लाघव हमें उस बीज की याद दिलाता है, जिसमें विराट सत्य जैसा विशाल पेड़ छिपा रहता है। वह सर्वतन्त्र, स्वतंत्र, स्वायत्त और पूर्ण विधा है।” (फ्लैप पर/ पृ. 16)

प्रथम सत्र के अंतर्गत स्वागत भाषण एवं दस लघुकथाओं – भीतर का सच (राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’), सभ्य असभ्य (जगदीश बत्रा), काली बिल्ली (राजेन्द्र कृष्ण श्रीवास्तव), गोश्त की गंध (सुकेश साहनी), दण्ड (जगवीर सिंह वर्मा), जीत (डॉ. स्वर्णकिरण), मुखौटा (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’), रोबोट का कमाल (रामयतन प्रसाद यादव), बोफोर्स काण्ड (डॉ. सतीश पुष्करणा) एवं तीर्थ और पीक (डॉ. शंकर पुणतांबेकर) के पाठ को प्रस्तुत किया है। यहाँ प्रस्तुत लगभग सभी लघुकथाएँ संवेदना एवं कथ्य की दृष्टि से भिन्न-भिन्न है। इन लघुकथाओं के बारे में आठ महानुभावों (डॉ. सतीशराज पुष्करणा, डॉ. स्वर्ण किरण, अशोक भाटिया, उमेश महादोषी, गम्भीरसिंह पालनी, डॉ. शंकर पुणतांबेकर, मनोहर सुगम एवं जगदीश कश्यप) के मंतव्य को ‘विमर्श’ में पढ़ा जा सकता है। सभी ने इन लघुकथाओं की पड़ताल के मामले में कोई कसर नहीं छोड़ी है। प्रथम लघुकथा ‘भीतर का सच’ आतंरिक संघर्ष का सुन्दर चित्रण है, तो ‘सभ्य असभ्य’ यथार्थवादी सजीव चित्रण को दर्शाता है। कथ्य की दृष्टि से ‘काली बिल्ली’ नारी दुर्दशा और मानवीय संवेदना को प्रस्तुत करती हुई लघुकथा है जो कि शिल्प की दृष्टि से उतनी खरी नहीं उतरी। सुकेश साहनी कृत ‘गोश्त की गंध’ प्रतीकात्मक लघुकथा होते हुए भी बेजोड़ है, श्रेष्ठ है और पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ने में बेहद सफल है। अच्छे कथानक के बावजूद ‘दण्ड’ एवं ‘जीत’ लघुकथाओं को शिल्प की दृष्टि से उतनी सफल नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक स्थितियों पर करारा व्यंग्य करती हुई ‘मुखौटा’ एक सफल लघुकथा है। ‘रोबोट का कमाल’ जनवादी लघुकथा, ‘बोफोर्स काण्ड’ राजनीतिक लघुकथा एवं ‘तीर्थ और पीक’ विरोधभास की स्थिति दर्शाती लघुकथा है।

द्वितीय सत्र के अंतर्गत भी दस लघुकथाओं को सम्मिलित किया गया है। इनमें – दृष्टि (गम्भीर सिंह पालनी), अनबन (डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी), रणकौशल के बावजूद (कुलदीप जैन), पुलिसिए (विनोद कापड़ी ‘शान्त’), नौकरी और नौकर (कन्हैया लाल विद्यार्थी), अच्छे बच्चे(एस. कालरा), चोला (रमेश गौतम), गौ भोजनम् कथा (बलराम अग्रवाल), रिश्ते (जगदीश कश्यप) तथा  रंग (अशोक भाटिया) लघुकथाएँ सम्मिलित है। उपर्युक्त लघुकथाओं के विमर्श में बारह महानुभावों के विचारों को ‘विमर्श’ खंड में पढ़ा जा सकता है। ‘दृष्टि’ बेरोजगारी के पहलू को उजागर करती हुई लघुकथा, ‘अनबन’ नीति-उपदेश देती हुई लघुकथा, ‘रणकौशल के बावजूद’ एक मनोवैज्ञानिक लघुकथा है। एक संवेदनशील पुलिसवाले  का चित्रण ‘पुलिसिए’ में देखा जा सकता है, ‘नौकरी और नौकर’ हमारी विरूप व्यवस्था की ओर संकेत करती हुई लघुकथा है, ‘अच्छे बच्चे’ गरीबी-भुखमरी एवं सामाजिक विषमता का चित्रण करती लघुकथा है और ‘चोला’ राजनीतिक व्यंग्य के साथ प्रजातंत्र की भयावहता प्रस्तुत करती है।  ‘गौ भोजनम् कथा’ सांप्रदायिक सद्भाव को प्रस्तुत करती एक मनोवैज्ञानिक एवं मानवीय संवेदना को प्रस्तुत करती श्रेष्ठ, सशक्त लघुकथा है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करती ‘रिश्ते’ एक सुन्दर लघुकथा बन पड़ी है। ‘रंग’ संवेदनात्मक अनुभूति को प्रस्तुत करती अच्छी लघुकथा प्रतीत हुई।

तृतीय सत्र के अंतर्गत सत्रह लघुकथाओं को रखा गया है। यह सत्रह लघुकथाएँ इस प्रकार है –  ओवर टाइम (विनोद कापड़ी शान्त), जानवर (कन्हैया लाल विद्यार्थी), रक्षा कवच (कुलदीप जैन), संस्कार (रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’), फुटबाल (बलराम अग्रवाल), ड्राइंगरूम (सतीशराज पुष्करणा), गर्म हवाओं में नमी (भगीरथ), एहसान (जगदीश बत्रा), थर्मस (जगदीश कश्यप), मरियल और मांसल (डॉ. शंकर पुणतांबेकर), सच्चा प्यार (अशोक भाटिया), जैसी करनी (रामयतन प्रसाद यादव),फीस (गम्भीर सिंह पालनी), गाजर घास (सुकेश साहनी), पैसे का सत्य (जगवीर सिंह वर्मा), समाज सेवक(राजेन्द्र कृष्ण श्रीवास्तव) और  आर्थिक हानि (राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु’)। उपर्युक्त सभी लघुकथाएँ कथ्य के वैषम्य को तो प्रस्तुत करती ही है, इसी के साथ अधिकांश कथाओं में लेखकों ने मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं मानवीय संवेदना को बखूबी उतारने का प्रयास किया। ‘ओवर टाइम’ और ‘जानवर’ यथार्थवादी-मनोवैज्ञानिक लघुकथाएँ है। ‘रक्षा कवच’ में समाज में फैली हैवानियत का चित्रण, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ नारी की सूझ-बूझ को अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया है। ‘संस्कार’ हमारे बदलते मानवीय मूल्यों एवं संस्कारों का सशक्त यथार्थ चित्रण करने में सफल है, ‘फुटबाल’ मानवीय संवेदना को बखूबी प्रस्तुत करती लघुकथा है तो ‘ड्राइंगरूम’ मातृत्व संवेदना से परिपूर्ण है। वहीं ‘गर्म हवाओं में नमी’ मजदूर की दशा बयाँ करती है तो ‘एहसान’ आर्थिक विषमता तथा मानवीय संवेदना दर्शाती है और ‘थर्मस’ लघुकथा मनोविज्ञान एवं मानवीय संवेदना को प्रस्तुत करती है। ‘मरियल और मांसल’ एक प्रतीकात्मक लघुकथा के रूप में सार्थक है। गिरते मानवीय मूल्यों और संवेदना को ‘सच्चा प्यार’ में देखा जा सकता है। जलने का दर्द वही बता सकता है जो स्वयं जला हो – इस उक्ति चरितार्थ करती लघुकथा ‘जैसी करनी’ अपनी आप बीती प्रस्तुत करती है। वृद्ध विमर्श को दिखालती सशक्त लघुकथा ‘गाजर घास’ एक संवेदनशील, बहुत बढ़िया लघुकथा बन पड़ी है। बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे युवकों का चित्रण ‘फीस’ में देखा जा सकता है, ‘पैसे का सत्य’ में यथार्थवादी कथ्य के साथ अस्पष्टता को देखा जा सकता है। ‘समाज सेवक’ समाज में व्याप्त भ्रष्टाचारी-धोखेभाजी को बयाँ करती एक अच्छी लघुकथा है। गरीबी से जूझती ज़िंदगी के यथार्थ को संवेदनापूर्वक प्रदर्शित करती हुई ‘आर्थिक हानि’ मर्म को छूने में सफल है।

लघुकथाओं के साथ उन पर हुए विमर्श को पढ़कर कई बातें जानने को मिली, विमर्शकर्ताओं के भिन्न-भिन्न विचारों से परिचित होने का अवसर प्राप्त हुआ। आशा है कि इस विमर्श से साधारण पाठकों को प्रतीकों के प्रयोग एवं जटिल शैली वाली लघुकथाओं को समझने में सरलता होगी। अंतिम सत्र वाली लघुकथाओं के बारे में भी यदि विमर्श होता तो प्रस्तुत सत्र की लघुकथाओं को समझने में और लघुकथाओं के कथ्य-शिल्प के सन्दर्भ को लेकर पाठकों के सामने और बातें खुलकर आती।

इन लघुकथाओं में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण, आतंरिक संघर्ष (अंतर्द्वंद्व), सामाजिक-आर्थिक-पारिवारिक विषमता के साथ यथार्थवादिता का बखूबी प्रस्तुतीकरण देखा जा सकता है। कुछ लघुकथाओं में सफल प्रतीकों का प्रयोग, सहज-सशक्त भाषा, सफल शीर्षक आदि के चलते शिल्प-संरचना सुदृढ़ बन पड़ी है। कुछ लघुकथाएँ अच्छे कथ्य के बावजूद शिल्प के स्तर पर अपना जादू बिखेरने में असफल रही। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि प्रस्तुत संकलन में सभी लघुकथाओं से गुजरते हुए पाठकों को आनंद की अनुभूति अवश्य होगी। आशा है यह संकलन नवोदित एवं स्थापित सभी के लिए उपयोगी सिद्ध होगा। संकलन में सम्मिलित सभी रचनाकारों को बधाइयाँ। इनमें से कई रचनाकार तो आज भी सृजनरत है और साहित्य जगत को समृद्ध बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं। इस तरह के उत्कृष्ट कार्य के लिए संपादक द्वय को हार्दिक शुभकामनाएँ एवं साधुवाद।

कृति : आयोजन(लघुकथा- विमर्श), संपादक : सुकेश साहनी/रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, मूल्य : 220 /-, पृष्ठ : 108,  द्वितीय संस्करण : 2021, प्रकाशक : अयन प्रकाशन, 1/ 20 ,महरौली, नई दिल्ली -110030

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