गढ़वाली अनुवाद: डॉ.कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’
सैर माँ दंगा ह्वेगी। घौरु पर आग लगयेणी छै। छोटा बच्चों तैं भालौ कि नोंकु परैं उच्छाँळा छा। वु द्वी चौबट्टा परैं आई गैंनि। आज सि पैलि ऊँन एक दूसरा तैं नि देखि छौ। ऊँका आँखों माँ ल्वे उतरि गे। ऊँका धर्म अलग-अलग छा। पैलान दुसरा तैं ब्वे कि गाळी द्याई , दुसरान पैला तैं बैंणि कि गाळी देकि धमकाई। द्वियोंन अपड़ा-अपड़ा चक्कू भैर गाड़ेन। हाडगा चबौन्दू उखि नजीक मूँ खड़ू कुकूर गुगराई। वु द्वी एक-दुसरा तैं जान सि मन्नै धमकी देंणा छा। हाडगा छोड़ि कि कुकूर ऊँकी तर्फाँ देखण लगिगे।
ऊँन हत्थन तोलिकि एक-दुसरा पर छुरन मारी। द्वी छपटै कि चौबट्टा बिच मूँ भ्वीं पड़ि गेन। जमीन ल्वेन भिजे गि। कुकूरन नजीक ऐकि द्वियों तैं सूँघि। कंदूड़ हलकैंन । बारि- बारि करिक द्वियों का ऐंच पिसाब करी अर फीर सुख्यूँ हडगु चबौंण बैठि ग्याई।
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