शहर में अम्मा का मन नहीं लगता था, पर हर साल-दो साल में बेटे के पास दिल्ली आकर कुछ दिन रुका करती थी। फ़ुरसत में होते ही बेटा माँ को गाड़ी में घुमाने ले जाता। अम्मा दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतें देख चुकी थी, राजघाट पर गाँधी की समाधि पर तो वह हर बार जाती थी। इस बार घूमते हुए उसने एक इमारत को देखा तो बेटे से पूछा, “यहाँ के है बेटा?”
“यह दिल्ली की सबसे बड़ी लाइब्रेरी है। लाखों किताबें हैं यहाँ, पर तुम्हें क्या करना है?”
“इस इमारत में सब को जाणे की इजाज़त है?”
“हाँ।”
“तो फेर चाल, मैं देखणा चाहूँ।”
“पर तुम…?”
“चाल भी ईब।” माँ बेटे को लगभग धकेलती हुई अंदर दाख़िल हुई। वहाँ कुर्सियों पर बैठे बहुत से लोग पढ़ या लिख रहे थे। दूर-दूर तक किताबों से भरी अलमारियाँ थीं। अम्मा एकदम से चीखी, “ओह, इतणी किताब!” वहाँ बैठे लोगों ने चौंक कर उस चिल्लाती हुई ठेठ गंवई औरत को देखा। बेटे की आँखों और चेहरे पर शर्मिंदगी उतर आई। वह धीरे से माँ के कान के पास बोला, “लोग पढ़ रहे हैं अम्मा, शोर मत करो।”
“अच्छा, मैं तो कह रही थी एक जगहाँ इतनी किताब! इननै कोई भी पढ़ सकै है?” अम्मा फुसफुसाई।
“हाँ, पर तुम्हें क्या लेना है? तुम तो कभी स्कूल भी नहीं गई।”
“स्कूल नहीं गई पर पढ़ ल्यूँ हूँ मैं। अपणे पोते की सारी हिंदी की किताब पढ़ी हैं मन्नै। यहाँ पढण खातर किताब क्यूकर मिलैगी, कौण देगा?”
“वो उधर जो आदमी बैठा है न, वो बताएगा।” अम्मा तेज़ क़दमों से उस तरफ़ बढ़ चली। बेटा माँ के उत्साह को देख चकित था। इस वक्त न तो उसके घुटने दर्द कर रहे थे, न दम फूल रहा था। क्षण भर में ही माँ बेटा अटैंडेंट के सामने खड़े थे। अम्मा ने पूछा, “बेटा मन्नै भी किताब पढ़णे को मिलेगी?”
अटैंडेंट को लगा जैसे उसके सामने उसकी अपनी माँ खड़ी है – वही क़द, वही पहनावा, वही ठसक, बोलने का वैसा ही अंदाज़। उसके होठों पर अनायास एक स्निग्ध मुस्कान तैर गई। उसने कहा, “हाँ, हाँ, क्यों नहीं, क्या पढ़ना चाहेंगी आप?”
“कहाणियों की कोई किताब है आपके पास?”
“बहुत सारी हैं, चलिए दिखाता हूँ।”
अब वे तीनों एक अलमारी के सामने थे। अटैंडेंट ने अलमारी खोल दी और कहा, “ये अलमारी कहानियों की किताबों से भरी है। सिर्फ़ यही नहीं, इसके आगे की बीस अलमारियों में भी कहानियों की किताबें हैं। आपका जो मन चाहे, पढ़ें।”
अम्मा ने एक किताब निकाली। उसकी काँपती उंगलियों ने किताब की समूची देह को टटोला, फिर पूछा, “कितणे बजे तक खुली रहेगी लाइब्रेरी?”
“रात को ग्यारह बजे तक।” अटैंडेंट ने कहा। अम्मा अपने बेटे से मुख़ातिब हुई, “अच्छा तो अब तू अपणा काम कर, ग्यारह बजे लेण आ जइयो।” बेटे ने महसूस किया कि जैसे उसके सामने माँ नहीं, विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली कोई युवती खड़ी है। वह मुस्कुराया, तुरंत ही उसके मन की बात होठों पर आ गई, “अम्मा तुम तो यहाँ आकर जवान हो गई हो।”
“पहली बार दिल्ली आण पै मन्नै यहाँ ले आया होता तो मैं बूढ़ी होती ही नहीं। अच्छा अब तू जा, मन्नै पढ़ण दे।”
जाते जाते बेटे ने देखा – माँ की स्निग्ध उंगलियों की नमी उसके हाथ में थमी किताब पर उतर आई थी।
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