मैं एक कहानीकार हूँ, यह आप जानते ही हो वैसे।
यूँ तो यह बहुत बढ़िया बात नहीं है, फिर भी मैं आज अपनी प्रशंसा में एक कहानी लिख रहा हूँ।
आज मुझे छुट्टी है। मिसेज ड्यूटी पर गई है। अभी-अभी मैं उसे सड़क पर छोड़कर आया हूँ। वहाँ से वह आटो में बैठकर चली जाएगी।
घर पर सर्वेट ने अपना काम पूरा नहीं किया है। वह पोचे लगा चुकी है और बस बर्तन साफ करके, काम पूरा कर चली जाएगी।
मैं अपने कमरे में आकर लेट गया हूँ। सुबह के अभी नौ बजे हैं, पर गर्मी अभी ही पसीने निकाल रही है। मैंने एसी चला लिया है और पुस्तक लेकर पढ़ने लग गया हूँ।
थोड़ी देर बाद, सर्वेट धीरे से दरवाजा धकेल कर, मुँह अंदर की तरफ करती है। मुझे पता है कि वह क्या कहेगी,वह दरवाजा खोलकर अन्दर आ गई है।
‘‘पाँच मिनट यहाँ बैठ जाऊँ। फिर आपको चाय बना दूँगी जाने से पहले।’’ वह पाँच मिनट के लिए ठंडक में बैठना चाहती है। मैं उसकी तरफ देख रहा हूँ। वह मुस्करा रही है। उसके चेहरे की भोली मुस्कराहट आकर्षित करने वाली है।
मैं उसे ‘हाँ’ के अंदाज में सिर हिलाकर इशारा करता हूँं।
मैं फिर पुस्तक में खो गया हूँ। मेरे सामने वह कहानियाँ घूमने लग जाती हैं, जिनमें ऐसे दृष्य होते हैं, मतलब घर में अकेला आदमी और लेडी सर्वेंट ।
मैं पुस्तक हटाकर उसकी तरफ देखता हूँ। वह बालों में हाथ फेरती,बालों का पसीना सुखा रही है। मेरे देखने के समय ही, वह भी मेरी तरफ देखती है और फिर मुस्कराती है।
ठीक पाँच मिनट के बाद, चाहे उसने घड़ी नहीं पहनी, वह उठी और कहा, ‘‘चाय लाती हूँ।’’ और चली जाती है।
वह चाय का कप मेरे सामने लिए खड़ी है। मुझे लगा? जैसे कुछ कहना चहाती है। मैं चाय का घूँट भरने के बाद कहता हूँ, ‘‘क्या बात! चीनी डाल दी?’’
‘‘नहीं जी, मुझे पता है आपका,पर आज तो दूध में पानी मेम सा’ब खुद मिलाकर गए थे। मैंने तो उसे उबाला और ये छोटी-सी चाय की थैली इसमें डाल दी, बस।’’
‘‘चल ठीक है।’’ मैं बस इतना ही कहता हूँ।
वह हँसती हुई चली जाती है। उसकी आँखें जैसे मेरा ‘धन्यवाद’ कर रही हों और कह रही हों-‘बाबू जी, आप बहुत अच्छे हो।’’
किस तरह लगी कहानी, मैंनेकहा था न शरू में। वास्तव में मैंने यह कहानी सभी मर्दो की प्रशंसा में लिखी है, सिर्फ उनको छोड़कर कर जो औरतों की आँखों ,गालों, छाती, नाभि व और नीचे टाँगों तक पता नहीें….चलो छोड़ो, क्या कहना, कभी उन्हें भी सदबुद्धि देंगे ।