जून 2026

पुस्तकआयोजन -2020     Posted: November 1, 2021

आयोजन -2020 (लघुकथा संकलन )-एक समग्र प्रयास:संपादक – डॉ नीरज सुधांशु, प्रकाशक- वनिका पब्लिकेशंस , पृष्ठ- 160,मूल्य- 250रुपये, प्रथम संस्करण-– 2021

फेसबुक पर लघुकथा का भव्य आयोजन और उस समूचे कार्यक्रम की पुस्तक का हाथों में होना एक सुखद अनुभूति है|

पुस्तक का बाहरी आवरण और कागज देखें तो निश्चित ही उम्दा है| दूर तक फैले सिन्धु से किनारे पर शंख का चित्र है जो बताता है कि लघुकथाओं के समन्दर में से शंख सी लघुकथाएँ और आलेख इसके अंदर हैं|अनुक्रम देखकर पुस्तक का नाम एक समग्र प्रयास उचितबैठता है |इस अनुक्रम के अनेक पड़ाव हैं जो अपनी यात्रा को सुनिश्चित करते हैं

अनुक्रम के पहले पायदान पर लघुकथा की महक सौंधी ही होनी चाहिएके अंतर्गत  समीक्षक जितेन्द्र जीतू जी की उत्तम समीक्षा है | उनके अनुसार लघुकथा को सबसे पहले ग्राह्य होना चाहिए | प्रतीकात्मकता बनाने के चक्कर में यह गुण न खो जाए | सम्प्रेषण तो निबन्ध में भी होता है, किन्तु लघुकथा में कथा जरूरी है |पठनीयता एक बड़ी शर्त है | सभी लघुकथाओं बहुत बढ़िया अवलोकन जीतू जी ने किया है |

ऑनलाइन स्पर्धाएँ और लघुकथा आयोजन 2020′ नामक लेख में पुस्तक के संपादन मंडल में प्रमुख मृणाल आशुतोष जी ने पूरे कार्यक्रम की पूरी कहानी लिखी, जो रोचक रही | साथ ही इन सभी मृणाल आशुतोष, वीरेंद्र वीर मेहता, चित्रा राणा राघव, दिव्या राकेश शर्मा,कुमार गौरव द्वारा तैयार की गई योजनाओं की जानकारी मिली|

एक नए युग का सूत्रपातके नाम से दिव्या राकेश शर्मा का लघु लेख है, जिसमे वे इसी तरह के अन्य वृहद आयोजनों की शुभाकांक्षी हैं |’फ्लैशबैक एक छललेख में कुमार गौरव कहते हैं – रचनाकार वर्जनाओं से परे है| लेकिन कालखंड दोष हटाने के लिए फ्लैशबैक …यह तो सरासर लघुकथा और पाठकों के साथ छल है| ‘विधा में राजनीति के खिलाफ बड़ा स्टेटमेंट रहा आयोजन 2020′ में चित्रा राणा राघव लिखती हैं – कौन टिकेगा ,कौन नहीं टिकेगा, क्यूँ न यह चुनाव गुणवत्ता व समय पर छोड़ दिया जाए और अच्छी लघुकथाओं को बिना कोई वर्ग, समूह देखे- जाने सराहा जाए| राजनीति यदि अराजकता के स्तर तक जाए तो यह विधा की हानि है|’ अपने संपादकीय में डॉ नीरज सुधांशु लिखती हैं कि लघुकथाकार जी जान से विधा को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं और सफल भी हो रहे हैं|

अब बात करते हैं पुरस्कृत लघुकथाओं की जिसमे प्रथम पुरस्कार प्राप्त लघुकथा – सोंधी महक – वाकई सोंधी है और अव्वल नम्बर की है | इस लघुकथा का शिल्प नए विषय पर संवाद शैली में वह सब कुछ प्रदान कर देता है जो सफल लघुकथा की दरकार होता है | व्याख्यान देना और उन्हें व्यावहारिक प्रयोग में लाना अलहदा बात है | इस लघुकथा की पात्र सोनी व्यवहार में उन आदर्शों को जीती है जो आज के समय की जरुरी माँग है | पर्यावरण को बचाने की कोशिश, छोटे बच्चों को योग सहित अन्य विषय पढ़ाना तथा घर की रोजी रोटी कमाने के साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखना – ये गुण उसके अंदर हैं भले ही शक्ल सूरत से वे मैच नही करते हों – जैसा कि इसमें ऐसा कहा गया है | यह नाम जाना पहचाना नहीं है लघुकथा क्षेत्र में किन्तु ताव रखता है उत्कृष्ट लघुकथा लेखन की |

यह सम्भव हो पाया फेसबुक पर आयोजित लघुकथा समूहों में आयोजित प्रतियोगिताओं में जबकि इन्हें बुरा भी माना जाता है कि बहुत स्कूल खुल गए हैं |हर चीज के दो पहलू होते हैं तो फेसबुक ने जहाँ भीड़ को मौका दिया है, वहीँ छनकर आने वाले लेखक व रचनाएँ भी हैं |

अन्य पुरस्कृत लघुकथाओं में विषय वैविध्य, रचना शिल्प का विधान खूबसूरत कलेवर में है| चन्द्रेश छतलानी की लघुकथा – मेरा घर छिद्रों में समा गया है – एक प्रतीकात्मक उम्दा लघुकथा है जिसका परिदृश्य व्यापक है |सम्पूर्ण भारत को इसमें शामिल किया है| इस तरह की रचनाएँ कम ही मिलती हैं|

चयनित लघुकथाओं में नम्रता सरन सोंना की परिंदेमें आज के अतिशिक्षित बच्चों के विदेश में सैटल होने की पीड़ा को परिंदों के प्रतीक से दिखाया है| अनुजित इकबाल की लघुकथा बेटीएक अलहदा विषय पर लिखी लघुकथा है जो बेहद मार्मिक तथा करुण है| कसा हुआ कलेवर और शिल्प का निर्वाह गजब है| ऋता शेखर मधु की लघुकथा -फिनिक्स- तेजाब से जली लड़कियों की कथा है जिसका अंत सकारात्मक है|भारती कुमारी की चश्मासाम्प्रदायिकता पर एक नया ही चश्मा चढ़ा सुकून देती है|

वरिष्ठों की लघुकथाएँके अंतर्गत आदरणीय वरिष्ठ और सिद्धहस्त लघुकथाकार हैं, जो खुद मशाल बन लघुकथा की राह रोशन करते आए हैं| इन सबकी लघुकथाओं पर लिखना सूरज को दिया दिखाने जैसा है|

सस्ता सौदामें वरिष्ठ लघुकथाकार आदरणीय पुष्करणा जी साम्प्रदायिक सद्भाव पर अंत करते हुए दोस्ती को प्रमुख रखते हैं| ‘दुर्भाग्यमें भागीरथ जी धार्मिक संकीर्णताओं पर कुठाराघात करते हुए जस की तस स्थिति को मार्मिक ढंग से दर्शाते हैं| ‘इतनी सी बातमें कमलेश भारतीय जी शासन तन्त्र अधिकारी वर्ग पर व्यंग्य करते हैं| रिश्वत लेने वालों की पोल खोलते हैं| अशोक भाटिया जी की समय की जंजीरेंइतिहास का बिम्ब लेकर बेहद कुशलता से बुनी गई लघुकथा है |

लघुकथा गुरु सुकेश साहनी जी की नंगा आदमीआदमी की सोच को प्रतीकात्मक रूप से उपस्थित करती है| साहनी जी की कमोबेश सभी लघुकथाएँ प्रतीकात्मक हैं जिन्हें पढ़कर दिमाग की धरती पर भूचाल आ जाता है| इस लघुकथा पर जितना लिखा जाए कम है| बलराम अग्रवाल जी की आधी अधूरी पूरी दास्तानमें जुलूस में निकले लोगों की देहयष्टि का प्रतीकात्मक वर्णन है| ऐसे लोगों की एक तरफा सोच पर प्रहार करती लघुकथा अपनी कहन में जबर्दस्त है| अंत सकारात्मक सोच की बानगी है| रामेश्वर कम्बोज हिमांशु जी की लघुकथा -चिरसंगिनी- बुराइयों में फंसे इन्सान की मनोवृति पर प्रहार करती है | श्याम सुंदर अग्रवाल जी की गोलियों के निशानमें नायिका के बदन पर चोट के निशानों को जलियाँ वाला बैग की गोलियों के निशान से एकरूप किया है | योगराज प्रभाकर जी की पीर पर्वत सीमें कन्या भ्रूण हत्या को धार्मिक लोककथा से जोड़ते हुए अंत सघन और चोटिल दिखाया है| मधुकांत जी की उबालमें पत्नी अपना क्रोध व दुःख पति की कमीज को पीट पीट कर शांत करती है| कमल चोपड़ा जी -एक उसका होना – में जमींदारी प्रथा पर करारा व्यंग्य करते हैं| फेंटेसी का पुट लिए मधुदीप जी की लघुकथा -बिना सर का धड़ – में प्रतीकात्मकता है जिसका वाक्य -उसके सर पर एक धड़ उग आया है जो कुछ सोचता भी है और समझता भी है- बहुत अहम है | यह वाक्य पूरी लघुकथा के मन्तव्य का पता देता है| रामकुमार घोटड़ जी की छत्रछायायूँ तो पर्यावरण से सम्बन्धित है, साथ ही इसमें स्त्री जो पति के अधीन रहती है, उसके जाने के बाद उसके द्वारा लगाए हुए पेड़ की छाया में उसे सुख मिलता है | यह बात जानकर बेटा भी एक पेड़ लगा देता है अर्थात पति और बेटे की छत्रछाया में स्त्री|कमल कपूर जी की -रोशनी का सफर – किन्नर की जिन्दगी का रोजनामचा है| संघर्ष से निकलते हुए अपने जैसे दूसरों की जिन्दगी को उज्ज्वल करने की भरसक कोशिश का फ़लसफ़ा है| माधव नागदा जी की परिचयमें ऑफिस में आई एक महिला कर्मचारी का इतिहास जानने का पूरा अधिकार रखते हैं पुरुष और उनके लगातार प्रश्नों के करारे उत्तर देकर भी वह रुंधे गले से बाहर निकल जाती है| यह दर्शाया गया है | यहाँ रचना कुछ कमजोर पड़ जाती है| यदि महिला की जगह सवाल करने वाले पुरुष दाएँ बाएँ होते तो रचना मजबूती हो जाती| यह सिर्फ मेरा नजरिया है| हो सकता है लेखक का कुछ और मन्तव्य हो जो मेरी मूढ़मति में न आया हो| क्षमा सहित|

सतीश राठी जी की ठोकरमें वंचित बच्चे का दर्द अमीरों की आतिशबाजी में से बचे फुस्स अनार को ठोकर मारने से निकल जाता है और उसका आक्रोश शांत हो जाता है|सुभाष नीरव जी की -खेल- में कुत्सित मनोवृत्ति के बुजुर्गों द्वारा छोटी बच्चियों के साथ गलत तरीके से छेड़खानी को दिखाया गया है जिसका विरोध भी वह बच्ची सबके सामने शोर मचाकर करती है| आज के समाज में इस तरह की घटना बहुतायत में होती हैं|सूर्यकांत नागर जी की संवेदनामें समाज के दो हिस्से अमीर और गरीब के रंग ढ़ंग को दिखाया है| साथ ही भिखारी बुढ़िया के अपने साथी के प्रति स्नेह से लघुकथा में तरलता आ गई है| शील कौशिक जी की भविष्यमें मार्मिकता का पुट है| साम्प्रदायिक दंगे कितना कुछ छीन लेते हैं,वे भी नादाँ मासूम बच्चों से – इस बात पर प्रकाश डाला है| रामनिवास मानव जी की साँपमें मनुष्य के भीतर बैठे अहंकार रूपी साँप का मजेदार वर्णन कथा के रूप में है| रूप देवगुण जी की दूसरा सचमें व्यक्ति के दोगले चरित्र का आख्यान है जो परिवार में सबकी मदद करके उसी परिवार की बेटी से गलत तरीके से उगाही ले लेता है|

उपर्युक्त सभी लघुकथाएँ अपने कथ्य में बेजोड़ हैं और लघुकथा के फ्रेम में स्पष्ट|

आयोजकों की लघुकथाओं में वीरेंद्र वीर मेहता की विरासतमें जैसी करनी वैसी भरनी के मन्तव्य को दिखाया है| कुमार गौरव की पीले पन्नेअलहदा वितान रचती है| एक उम्दा कहानी का कथ्य लिए यह लघुकथा स्त्री जीवन को अलग नजरिए से देखती है और खूबसूरती से निबाहते हुए मार्मिक अंत पर पूरा करती है| मन के सीले कोनों को यह लघुकथा छू जाती है| मृणाल आशुतोष की पटरियाँआधुनिक समय का सत्य उजागर करती संवेदनशील लघुकथा जिसमे भावुक शब्दों की कहन पटरियों का मन्तव्य स्पष्ट करती है| दिव्या राकेश शर्मा की रंगरेजस्त्री जीवन के विविध रंगों की संवेदनापरक मार्मिक बानगी है| नेहा शर्मा की सड़ककोरोना काल में उन मंदबुद्धि लोगों की बात करती है जो जीवन को महत्व न देकर सड़कों पर उतर आते हैं| चित्रा राणा राघव की बोझबहन भाई के रिश्तों की मार्मिक कथा है | नीरज सुधांशु की अप्रत्याशितशराबी पति से परेशान पत्नी की कथा है जिसके अंत में उसकी सास भी बहू के के साथ खड़ी हो अपने व्यसनी बेटे को नशामुक्ति केंद्र में भेजने को तैयार हो जाती है|

अंत में समर्थ वरिष्ठ आलोचकों लघुकथाकारों के सारगर्भित आलेख हैं|

लघुकथा के पक्ष सेश्री बलराम अग्रवाल जी लिखते हैं – रचनाकार का दायित्व है अध्ययन और चिन्तन मनन के द्वारा अपने अन्तकरण और मस्तिष्क को विस्तार देना, उन्हें व्यापकता प्रदान करना| बाहर की ही नहीं,भीतर की भी आँखों को खुला और चौकस रखना…… सबसे बड़ी चीज ध्यान है …आप जिस पर ध्यान देना शुरू कर देते हैं, वाही भाव आपके चिन्तन में सक्रीय हो उठता है….जितना ज्यादा अपने सपने के बारे में स्पष्ट होंगे,उतने ही प्रभावी आपके कथ्य होंगे और उतनी ही प्रभावी आपकी कथन शैली होगी|’ लघुकथा के विषय को लेकर उनका कहना है कि विषय में तार्किकता, ऐतिहासिकता तथा वैज्ञानिकता के साथ संवेदनात्मक प्रस्तुति हो|

लघुकथा सृजन सरोकारमें सुकेश साहनी बताते हैं कि लघुकथा विषय या विचार पर लेखक मनन करे ताकि उस विचार को दिशा और दृष्टि मिले|लघुकथा के समापन बिंदु पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि लघुकथा के समापन बिंदु को उस बिंदु के रूप में समझा जा सकता है जहाँ रचना अपने कलेवर के मूल स्वर को कैरी करते हुए पूर्णता को प्राप्त होती है|

योगराज प्रभाकर अपने आलेख –विषय आधारित लघुकथा लेखन:समस्यापूर्ति का आधनिक स्वरुपमें कहते हैंसमस्यापूर्ति साहित्य सृजन की कसौटी होती है |

स्वप्रस्फुटन एक क्रिया है और लेखन उस क्रिया की प्रतिक्रिया| हर रचना प्रक्रिया के नेपथ्य में कोई घटना, दृश्य,…………. जैसा कोई न कोई तत्व सदैव कार्य कर रहा होता है| यदि समस्यापूर्ति में यही काम आजकल प्रदत्त विषय या चित्र द्वारा हो रहा है तो बुरा क्या है?’

अंत तक आते आते लघुकथा आयोजन 2020 में प्रतिभागी समूह और उनके एडमिन की जानकारी दी गई है| सबसे अंत में आयोजकों का परिचय प्रस्तुत है|

लघुकथा विधा पर लघुकथाएँ और अनेक आलेख से सज्जित यह पुस्तक अत्यंत ही उत्तम बन गई है|

अंत में अपनी बात कहना चाहूँगी कि लघुकथा की यात्रा अर्वाचीन समय से चली आ रही है| पहले जो विषय थे, उससे यह आगे बढ़ी उसमे और विषय जुड़ते चले गए| कथ्य और शिल्प में भी अनेक प्रयोग सफल हुए | आज जो समस्यापूर्ति या चित्र या विषय देकर लेखन है उससे भी निश्चित तौर पर लघुकथा लेखन को बल मिला है और समर्थ लघुकथाकार आगे आए हैं| डायरी शैली, पत्र शैली , फेंटेसी अन्य तरह से भी लघुकथा सृजित की जा रही है और पसंद भी की जा रही है| जब हम लघुकथा को एक तय फ्रेम में सेट करने की कोशिश करते हैं तो लगता है कि लघुकथा जो एक परी है उसके सुंदर कपड़े काँटों में उलझ उलझ गए हैं| यदि लघुकथा का वास्तविक विकास चाहते हैं तो इसे नदी की नाईं अपने सहज बहाव में बहने देना होगा| अन्य विधाओं को देखें तो कविता, कहानी, उपन्यास के विषय और शिल्प में अनूठे प्रयोग हुए हैं| इसी तरह नित नूतन प्रयोग लघुकथा की शोभा बढ़ा सकते हैं बशर्ते कि वे पठनीय और रुचिकर हों तथा बेहतर सम्प्रेषण से युक्त हों|

-0-

 

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine