दसवीं कक्षा की क्लास लेते हुए अचानक सुधा मैम ने पूछा,” बच्चो!, यह बताओ कि आज सुबह का नाश्ता किए बगैर कौन- कौन आया है।”
एक छात्रा ने हाथ उठाया।
” क्या घर में कुछ बन नहीं पाया था?”
“बना था, पर उसे छोटी बहन के लंचबॉक्स में मम्मी ने देकर भेजा।”
“ऐसा क्यों, तुम्हें क्यों न मिला।”
“वह अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ती है न। मम्मी उसे अच्छा लंच देती है और उसकी ड्रेस भी कड़क होती है।”
सुधा मैम ने ध्यान दिया कि उसने स्कूल शूज़ न पहन कर चप्पल पहन रखी थी।
“सुनो, मम्मी को कहना कि वह तुम्हें भी साफ कपड़े दे और टिफिन भी।”
“पर वह हमेशा कहती हैं कि सरकारी स्कूल में सब चलता है।”
सुधा मैम ने उस दिन स्कूल की समापन सभा के समय कड़ाई से कहा, ” कल से सबको पूरे स्कूल ड्रेस में आना है और सभी के साथ लंचबॉक्स और पानी की बोतल होनी चाहिए।”
सभा विसर्जित होने के बाद सुधा मैम की कुलीग ने पूछा, “यह अचानक इतनी कड़ाई क्यों?”
” इसी कड़ाई की कमी है, तभी तो सरकारी स्कूल उपेक्षित है। इसके लिए सरकार क्या करेगी, जब मानसिकता ही सरकारी बनी रहेगी।”
सुधा मैम की चाल में बदलाव लाने की दृढ़ता झलक रही थी।
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