गढ़वाली अनुवाद: डॉ. कविता भट्ट
दफ्तर म खुट्टू रखदु वे तैं घबराहट हुणी छै। पता नी ऑफिसर कन्न ह्वालु। बात सुणलु बि कि भैर ई बिटी भगै देलु। काम होलु बि कि डांट ई मिलली। इन्नि चिन्ता माँ वा दफ्तरा क कागज हथ म पकडी खडु छै। घौरवळा क मुन्ना क बाद पेंसन क कागज जमा कन्न छा, पर हर बगत ऐकि बि भितर जाणै कि हिम्मत ई नी छै हुणि। वींकी परेसानी देखिक एक क्लर्क तैं आखिर दया ऐ गे।
‘‘जी बैणी ! क्य काम छौ? तुम कब बिटि यखी खडु छां।’’
वीं न बिना बोल्यां कागज अगनै बढै देन। मन माँ सोची, ‘यु कु छन? पता नी काम करवौंणा क कतगा पैसा माँगी देंदु ? पता नी काम करवालु बि कि चक्कर ई कटवालु?’ इन्नि कतगा कुछ सोच्याली वीं न एक मिनट म।
क्लर्क न कागज देखियाली छा।
‘‘बस इतगा इ काम च। ह्वे जालु जी तुम यु सब मि मुँ छोड़दि जावा। मि अफी करवै द्योलु, तुम तैं आणै की जरूरत नी च बस इकम सैंन कर द्यावा।’’
वींन अविश्वास सी देखि छौ, ‘‘पैसा कतगा देण पड़ला?’’
‘‘पैसा कन? क्वी पैसा न भै।’’ वु हैंसी गे, ‘‘मितैं क्वी पैसा नि चैंदु बैणी। बस तुमरू काम ह्वे जालु त तुम थैं फोन करि द्योलू। तुम निश्चिन्त ह्वे क जावा।’’
वीं का मन सी प्राथना निकळि गे। लोग झूठ ई डरौणा छा य त सैत सब्बि लोग एक जना नि हुंदन।
वींन सैन करिकि कागज पकडै यालि छा।
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