मेरी पसंद : हरभगवान चावला
मेरी नज़र में लघुकथा एक गंभीर विधा है, लेकिन हिंदी में लघुकथा का इतना विपुल मात्रा में उत्पादन (उत्पादन शब्द का प्रयोग साभिप्राय किया गया है) हो रहा है कि लघुकथा सदमे में है। अधिकांश लेखकों ने इसे आसान मानकर इस पर हाथ आज़माया है। आपको अलग-अलग लेखकों की बिल्कुल एक जैसी लघुकथाएँ अक्सर देखने को मिल जायेंगी। एक जैसे विषय, एक जैसी भाषा, एक जैसा ट्रीटमेंट। इस एकरस तथा उबाऊ ढेर में कम ही लघुकथाएँ अलग से ध्यान खींचती हैं। लघुकथा का कलेवर लघु अवश्य होता है, लेकिन इसका संदेश लघु नहीं होता। मुझे हैरानी होती है, जब मैं एक ही लेखक द्वारा एक ही विषय पर केंद्रित सौ लघुकथाओं के संग्रह को देखता हूँ। इन लघुकथाओं में पाँच-दस में यथार्थ का कोई नया कोण हो सकता है, शेष कथाओं में दोहराव स्वाभाविक है। सबसे पहले तो मैं लघुकथाकारों से अनुरोध करता हूँ कि कृपया कारख़ाने बंद करके सिर्फ़ वही लिखें जो नया भी हो और जो पाठक को मर्माहत भी करे। लघुकथा बेशक कुछ ही पलों की गाथा हो, इसमें सदियों की सच्चाइयाँ अंतर्निहित होती हैं। लघुकथाकारों को यह बात समझनी होगी।
बहरहाल, अब मैं उन दो लघुकथाकारों पर आता हूँ, जिनकी लघुकथाओं को मैंने ‘मेरी पसंद’ के लिए चुना है। इनमें पहले हैं वीरेंद्र भाटिया। वीरेंद्र भाटिया आज हिंदी कविता तथा लघुकथा में बहुपठित, बहुचर्चित नाम है। ये अपनी मान्यताओं को लेकर एकदम स्पष्ट एवम् मुखर हैं। पुरानी मानव विरोधी सोच तथा सत्ता प्रतिष्ठानों पर ये जमकर हमला बोलते हैं, इसलिए अक्सर एक ख़ास वर्ग के निशाने पर रहते हैं। अपने लेखन को ये सचमुच ही समाज की समीक्षा मानते हैं तथा ईमानदारी से अपने साहित्य से यही काम लेते भी हैं। अपनी एकमात्र प्रकाशित पुस्तक ‘युद्ध लड़ रही हैं लड़कियाँ’ (कविता संग्रह) को श्रेष्ठ कृति सम्मान हेतु हरियाणा साहित्य अकादमी को इसलिए नहीं भेजा कि कहीं कोई सरकारी पुरस्कार क़लम की धार को कुंद न कर दे। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान गंगा में बहकर आईं लाशों पर लिखीं इनकी लघुकथाओं ने हिंदी लघुकथा-जगत में हंगामा मचा दिया था। इनको हज़ार बार शेयर किया गया था, ज़ाहिर है गालियाँ भी ख़ूब मिलीं। इनका अभी कोई लघुकथा संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ है, पर इनकी लघुकथाओ ने आभासी संसार में धूम मचा रखी है।
इनकी लघुकथा ‘एजाज़’ एक मार्मिक रचना है। सदियों से हिंदुओं तथा मुसलमानों के बीच वैमनस्य को विभिन्न माध्यमों से हवा दी जाती रही है। दोनों के बीच भयानक दंगों का इतिहास भी है। दोनों समुदायों में अविश्वास का रिश्ता ख़ून में पैठ चुका है। इसके बावजूद इन समुदायों में भाईचारा रहा है, सौहार्द्र रहा है। राजनीतिक दलों ने ज़रूर लगातार दूरियाँ बढ़ाई हैं। वर्तमान में देश की पन्द्रह प्रतिशत आबादी को हाशिये पर धकेल देने तथा मुख्य धारा से बाहर कर देने के बहुत गंभीर प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में यह एक ज़रूरी लघुकथा है। एजाज़ प्रेम के परिवार का ड्राइवर है। अपने पिता की असहमति के बावजूद प्रेम ने उसे नौकरी पर रखा है। दंगों में फँसी बेटी को एजाज़ सुरक्षित ले आयेगा, प्रेम को ऐसा विश्वास है; जबकि उसके पिता तथा पत्नी को लगता है कि उसकी वजह से बेटी मुसीबत में पड़ जायेगी। आख़िर
में क्या हुआ, यह तो कथा पढ़ने के बाद ही आप जान पायेंगे। वीरेन्द्र भाटिया की कथाओं में हमेशा कोई वर्ग नहीं, इन्सानियत जीतती है। वे दोनों तरफ़ की कट्टरता को लताड़ लगाते रहे हैं। इस कथा का शीर्षक कमाल का है। एजाज़ का अर्थ होता है चमत्कार। कथा पढ़ चुकने के बाद यह अर्थ आपको चमत्कृत करता है। वीरेन्द्र भाटिया अपने समाज सापेक्ष कथ्य को स्थापित करने के लिए शब्दजाल का सहारा नहीं लेते। यद्यपि शिल्प के स्तर पर भी कथा में कोई कमी नहीं है, लेकिन उनकी प्राथमिकता कथ्य ही है।
दूसरे लघुकथाकार हैं सुरेश बरनवाल। सुरेश एकदम संकोची और अंतर्मुखी कवि-कथाकार हैं। वे कम बोलते हैं, कम लिखते हैं, लेकिन उनकी रचनाओं में संवेदनाओं की जैसे नदी बहती है। वे बेहद संजीदा रचनाकार हैं। कल्पना शक्ति का जैसा इस्तेमाल वे करते हैं, वैसा बिरले ही कर पाते हैं। मानव मनोविज्ञान के वे अद्भुत चितेरे हैं – सुरेश बरनवाल की लघुकथा हँसी को पढ़ने के बाद आपको यक़ीन हो जायेगा। भारतीय समाज में औरत की अपनी कोई मर्ज़ी नहीं रही है। उसका खाना, उसका हँसना, उसका रोना, उसका सोना- सब तयशुदा परिपाटी और नैतिकताओं में बँधा है। औरतों के पास दुखों का ख़ज़ाना होता है तो हँसी का भंडार भी। औरतें खिलखिलाकर हँस दें तो असभ्य कहलाती हैं। इसलिए वे अपनी हँसी को स्थगित करती चलती हैं, किसी बाँध में पानी जैसे अपनी गति को स्थगित कर दे। कल्पना करें अगर यह बाँध टूटे तो…। बेटी की गुदगुदी पहले तो माँ को बेटी के भविष्य को लेकर आशंकित करती है और फिर जैसे सारी वर्जनाओं, नैतिकताओं का बाँध टूट जाता है। सुरेश बरनवाल की लघुकथा हँसी एक बहुत ही मासूम सी कथा है जो खिलखिलाकर कर हँसने और उस हँसी के बीच रोने को मजबूर कर देती है। यह कथा समय के साथ स्त्रियों के बदलने की भी कथा है और बिना किसी व्याख्यान के सदियों के दर्द की गवाह भी है। लघुकथा कलश के संपादक योगराज प्रभाकर कहते हैं – लघुकथा में लाउड होना अलाउड नहीं है। निश्चय ही सुरेश बिना लाउड हुए सदियों की सच्चाई बयान कर जाते हैं।
मैंने आरंभ में कहा है कि लघुकथा में सदियों की सच्चाइयाँ अंतर्निहित होती हैं, दोनों लघुकथाओं को पढ़कर आप ऐसा पाएँगे। आख़िर में एक बात – यह बहुत महत्वपूर्ण है कि लघुकथा समाज को संदेश क्या देती है और किसका पक्ष लेती है? दोनों रचनाएँ सकारात्मक संदेश देती हैं।
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1-एजाज़
वीरेन्द्र भाटिया
“हेल्लो, टेलीविजन पर ख़बर आ रही है, शहर में दंगा हो गया है। शानवी ट्यूशन गयी हुई है, अभी लौटी नही है। पता करवाइए न, भेजिये किसी को ट्यूशन सेन्टर जल्दी।” गीता ने अपने पति प्रेम को दुकान पर फ़ोन किया।
“मैंने एजाज़ को भेजा हुआ है, काफ़ी देर हो गयी। लौटता ही होगा उसे लेकर। तुम चिन्ता मत करो।” प्रेम ने गीता को आश्वस्त किया।
फ़ोन की घंटी फिर बजी, उधर से प्रेम के पिता बोल रहे थे, “प्रेम, तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है क्या? शहर में दंगे भड़क गए हैं और तुमने एजाज़ को भेजा बिटिया को लाने?”
“तो क्या हुआ पापा?” प्रेम ने सरसरी जवाब दिया।
“मुझसे पूछ रहा है कि क्या हुआ? एक मुसलमान को बेटी लिवाने भेज दिया? सामान्य दिनों में तो और बात होती है, आज के दिन तो दिमाग़ खुला रखता कम से कम।” पिता ने क्रोधित होते हुए कहा।
“पापा इसमे हिन्दू मुसलमान कहाँ से आ गया । एजाज़ दस साल से नौकरी कर रहा है हमारे यहाँ। रोज़ वह ही ले कर आता है शानवी को।”
“तुम्हारा दिमाग़ ठिकाने लग जायेगा अगर बिटिया को कुछ हो गया तो। जब मुसलमान को नौकरी पर रखा था, तब भी मैंने मना किया था कि अपने धर्म का नौकर ठीक रहता है। धर्म-कर्म की कोई क़द्र है ही नहीं। किसी ने मुसलमान समझ कर ही हमला कर दिया तो बेटी की जान तो जोख़िम में आ गयी न। कितना ख़राब माहौल है मुल्क का। थोड़ा खुद भी सोचना चाहिए।”
इस बार प्रेम को थोड़ा डर लगा, लेकिन पिता को आश्वस्त करते हुए बोला, “आप निश्चिंत रहिए पापा। मैं एजाज़ को फ़ोन करता हूँ अभी।” और प्रेम ने फ़ोन काट दिया।
पापा ने फिर फ़ोन किया, “बात हुई क्या एजाज़ से? दंगे बहुत भड़क गए हैं। तुम घर मत आना, दुकान बंद करके वहीं खड़े रहना सब दुकानदार। दंगाई कोई दुकान जलाने की कोशिश करें, तो सब दुकानदार मिलकर विरोध करना उनका। और एजाज़ का बता जल्दी।” पिता ने बेसब्री ज़ाहिर की।
“पापा, एजाज़ का फ़ोन बन्द है। मैं शानवी के ट्यूशन सेंटर जा रहा हूँ।” दबी आवाज़ में प्रेम ने कहा।
“फ़ोन बंद है? वही हुआ न जिसका अंदेशा था। कहा था उसे मत भेज। अब जा जल्दी। फ़ोन कर मुझे वहाँ पहुँचकर। हे भगवान, पता नही क्या होगा” चिंतातुर पिता इधर-उधर घूमने लगे।
प्रेम गलियों में से घूमते हुए, बचते-बचाते ट्यूशन सेन्टर पहुँचा, ट्यूशन सेन्टर जल रहा था, आसपास की दुकानें जल रही थीं। भीड़ उत्सवमयी हुई जाती थी। प्रेम का ख़ून पानी होता जा रहा था। उसने डरते हुए पत्नी को फ़ोन किया, “गीता, ट्यूशन सेन्टर तो जल रहा है। कुछ नहीं पता चल रहा, सब तरफ आग और भीड़ है। बच्चे पता नही कहाँ हैं। बहुत डर लग रहा है मुझे।”
“क्या कह रहे हो आप। हिम्मत रखो। एजाज़ को फिर से फ़ोन करके देखो। क्या पता लग जाये फ़ोन। यह तो बड़ी ग़लती कर दी आपने एजाज़ वाली। बड़ों की बात सुननी चाहिए हमें। शानवी नहीं आई तो सब छोड़ेंगे नही आपको।” पत्नी की आवाज रध गई।
“तुम एजाज़ पर शक कर रही हो गीता। एजाज़ ख़ुद किसी मुसीबत में घिरा हो सकता है। फ़ोन लगा रहा हूँ, लग नही रहा।” प्रेम ने काँपते हुए कहा।
“ख़ुद घिरा होगा? आपको अब भी उसी की चिंता हो रही है? बेटी की चिंता करो। हम और घिर गए उसके चक्कर मे। एजाज़ के घर जाकर पता करो ।” गीता सुबकने लगी। प्रेम का मन शंकालु हो उठा- कहीं… नहीं ऐसा नहीं हो सकता…
प्रेम बाज़ार घूम आया, एजाज़ के घर जा आया। एजाज़ के घर कोई नहीं मिला। चार घण्टे बीत गए। प्रेम के पिता की तबीयत बिगड़न लगी। प्रेम उन्हें हस्पताल नही ले जा सकता था, क्योंकि बाहर का माहौल बहुत ख़राब था और भीतर बहुत हलचल मची थी। प्रेम का मन रोने को हो रहा था। तभी फ़ोन की घंटी बजी। पास के एक हस्पताल से फ़ोन था- आपकी बेटी यहाँ लायी गयी है। आप यहाँ आ जाइये प्लीज़।
प्रेम और गीता दौड़ कर हस्पताल पहुँचे। शानवी बहुत डरी हुई थी। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी।
“शानवी क्या हुआ।? बोलो बेटा, बोलती क्यों नहीं तुम? चार घण्टे से हम तुम्हें ढूँढ रहे हैं। एजाज़ तुम्हें लेने गया था, उसका नम्बर नही लग रहा। तुम्हारे ट्यूशन सेन्टर में आग लगी थी। और यह एजाज़ कहाँ है, कुछ पता है तुम्हें?”
“एजाज़…।” शानवी की जोर से रुलाई फूट पड़ी। वह सिसक-सिसक कर रोने लगी।
“क्या हुआ, वह ठीक तो है न?” प्रेम और गीता के मुँह खुले रह गए।
“ईश्वर करे वो ठीक हो…” बस इतना ही कह पाई वह।
“क्या हुआ उसके साथ? तुम कहाँ थी चार घण्टे, क्या हुआ शानवी, बताओ कुछ?” गीता ने सवालों की झड़ी लगा दी।
“ट्यूशन सेन्टर के नीचे दुकान में भीड़ ने आग लगा दी थी। सर तो भाग गए थे तभी। कुछ लड़कियाँ भी उतर आईं जल्दी से। मैं और मेरी तीन फ्रेंड्स आग में फँस गई थीं। हम सबसे ऊपर वाली क्लास में थे। एजाज़ पता नहीं कहाँ से चढ़कर आया। वह मुझे और मेरी एक फ्रेंड को दूसरे रास्ते से नीचे ले आया। तीसरी फ्रेंड को लाने गया तो वापस नहीं आया। मुझे बस इतना ही याद है। उसके बाद मैं बेहोश हो गयी। होश आया तो मैं यहाँ थी।”
गीता सन्न खड़ी थी। प्रेम के भीतर से दहाड़ निकली, “एजाज़!!!!!!$!!$!$!$!$$!$
और प्रेम फूट-फूट कर रोने लगा।
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2-हँसी
– सुरेश बरनवाल
”इतने दाँत मत दिखाया कर!” माँ ने उसे स्नेह से झिड़का, “सारा दिन हा-हा-ही-ही करती रहती है। अब बड़ी हो रही है। कल को ससुराल जाएगी तो वहाँ बुरा मानेंगे सब लोग। कहेंगे लड़की में शऊर नाम की चीज़ ही नहीं।”
“माँ, हँसने का भी कोई बुरा मानता है क्या?” वह फिर हँसी।
माँ ने अपनी जवान होती बेटी के खिले चेहरे की तरफ़ देखा और एक कसक-सी उभर आई। उसकी आँखों में नमी झलकी, फिर ख़त्म हो गई।
बेटी ने माँ की तरफ़ देखा और अचानक माँ का दुपट्टा खींचकर हवा में उछाल दिया। माँ कुछ समझती कि बेटी ने माँ को गुदगुदी कर हँसाना शुरू कर दिया। माँ पहले घबराई, फिर ग़ुस्सा हुई, फिर हँसने लगी। अब वह ज़ोर से हँस रही थी। बेटी ने गुदगुदी बन्द कर दी थी, फिर भी माँ हँसे जा रही थी। वह अब यूँ हँस रही थी मानो, अल्हड़ उम्र में रुकी उसकी हँसी का कोई बाँध टूट गया हो।
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