जून 2026

दस्तावेज़रमेश बत्तरा का लघुकथा साहित्य     Posted: May 1, 2022

साहित्य की नित नई सृजित धारा में अपना योगदान देने वाले ऐसे कई श्रेष्ठ नाम अतीत का हिस्सा बन चुके हैं, जिनके साहित्य-सृजन अंश का ऋणी साहित्य जगत हमेशा रहेगा। हालाँकि ऐसे कई नाम लोगों की स्मृति से समय के साथ लुप्त भी होते जा रहे हैं, जिनकी विरासत को सहेजना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। ऐसे ही एक नाम से जिसकी स्मृतियों को नई पीढ़ी से अवगत करवाना नितांत अनिवार्य था; को पुस्तक रूप में सामने लाने का श्रेष्ठ प्रयास किया गया है। यह प्रयास है साहित्यकार रमेश बत्तरा के कृतित्व पर आधारित पुस्तक ‘सवाल-दर-सवाल’ के प्रकाशन का।

लघुकथा साहित्य के जाने माने लघुकथाकार, आलोचक एवं श्रेष्ठ समीक्षक अशोक भाटिया द्वारा  संपादित की गई इस पुस्तक का सृजन क्यों और किन परिस्थितियों में हुआ; इसे समझने के लिए, सर्वप्रथम इस पुस्तक की भूमिका ‘दो शब्द आपसे’ पर मंथन करना नितांत आवश्यक है; क्योंकि सही मायनों में यह पुस्तक रमेश बत्तरा की रचनाओं का एक संकलन मात्र नहीं है, बल्कि यह संकलन उससे कहीं आगे बढ़कर एक विशेष श्रद्धांजलि प्रयास है जो कुछ श्रेष्ठ लघुकथाकारों द्वारा विधा के एक सशक्त हस्ताक्षर रमेश बत्तरा के अधूरे सपने को साकार करके, किया गया है। (यहां यह बताना भी ग़ौरतलब रहेगा कि स्वयं रमेश बत्तरा ‘सवाल-दर-सवाल’ शीर्षक से अपना लघुकथा संग्रह छपवाना चाहते थे, जो किसी कारण संभव नहीं हुआ)।

पुस्तक के संपादक द्वारा अपने संपादकीय में की गई स्वीकारोक्ति में यह कहना कि वर्ष 2014 में हरियाणा ग्रंथ अकादमी के लिए लिखी ‘समकालीन हिंदी-लघुकथा’ की आलोचना-पुस्तक में दिवंगत रमेश बत्तरा को ‘प्रतिनिधि’ की अपेक्षा ‘अन्य प्रमुख लघुकथा-लेखक’ के वर्ग में रखकर विवेचित करने का कार्य बाद में उनके लिए एक ग्लानि का विषय बन गया; जिससे मुक्त होने के उपक्रम में उन्होंने इस पुस्तक को किया, उनकी साहित्यिक भावनाओं और प्रतिबद्धता का एक सुंदर उदाहरण है।

पुस्तक के प्रथम खंड ‘मत अभिमत’ का आरम्भ होता है संस्मरण अपने प्रति लापरवाह थे रमेश से। जिस बेबाकी से उनके जीवन के भिन्न पहलुओं को ‘जया रमेश’ ने सामने रखा है, वह सतत उनके जीवन के घटनाक्रम को समझने के लिए काफी है। उनके लेखन के प्रति बात करते हुए जब जया लिखती हैं. . .”शब्दों के प्रति उनका क़तई मोह न था। एक-एक शब्द उनका नपा-तुला होता था। रमेश जो लिखते थे, बहुत उम्दा लिखते थे। उन्होंने सिखाया कि एक शब्द रिपीट नहीं होना चाहिए। वे अपने वाग्जाल में ख़ूब उलझा जाते थे, ठीक मंटो की तरह। बस, यही बात संजीदा है कि सब कुछ अधूरा अँधेरा-सा फैलाकर चला गया क़लम का वह जादूगर।”   . . . तो लगता है, सच में यह शक़्स साहित्य को अपनी जादूगरी ही दिखाने आया था। रमेश बत्तरा के निजी जीवन का एक कड़वा सत्य था ‘शराब’, जिसके संदर्भ में जया रमेश के शब्द “शराब तो एक बहाना बन गई थी। किसने किसको पिया, किसको जिया, पता नहीं… पर रोज़ाना की किच-किच से अज़ीज़ आकर यारों के यार ने उसे खो दिया और यारों का यार अपने चहेतों से परे चला गया।” सहज ही उनके दुःख का अंदाजा और लोगों का उसको न समझ पाने का दर्द ही शायद उन्हें इस अंजाम तक ले आया था।

साहित्यिक लोगों के बीच घिरे होने के बावजूद, उनके अकेलेपन के एहसास का अनुभव तो ‘प्रो. फूलचंद मानव’ द्वारा लिखे संस्मरण में भी बख़ूबी नजर आता है। वहीं ‘सुशील राजेश’ जब अपने संस्मरण में कहानीकार रमेश बत्तरा में बसे लघुकथाकार की व्याख्या करते हैं, तो उनकी लघुकथाओं में प्रतीकात्मक नजरिए की अधिकता और कल्पना से जुड़े कथ्यों में भी ज़मीनी हकीक़त के समावेश देखने के साथ ये बात सामने रखना नहीं भूलते कि संपादन और भाषा के इस जादूगर के अंदर का साहित्यकार कहीं न कहीं अपनी ही भूल-भुलैया में खोने लगा था। रमेश बत्तरा से रही नजदीकियों का जिक्र करते हुए ‘अशोक जैन’ अपने संस्मरण में , उनके मौलिक लेखन के प्रति स्पष्ट नजरिए के साथ उनके भाषा सौंदर्य का भी एक अच्छा उदाहरण देते हैं। तो अपनी संक्षिप्त टिप्पणी में एक और जहाँ’बलराम’ रमेश बत्तरा की लघुकथा ‘सिर्फ हिंदुस्तान’ और ‘खोया हुआ आदमी’ की सधे हुए शब्दों में विवेचना करते हैं, वहीं सुभाष नीरव ‘उनकी’ लघुकथाओं में समाज के निम्न मध्यम वर्ग की संवेदना और उस वर्ग के संघर्ष पर टिकी उनकी कलम की तीक्ष्णता को व्यक्त करते हैं

वरिष्ठ साहित्यकार भगीरथ परिहार द्वारा रमेश बत्तरा के साहित्यिक जीवन की पड़ताल करता आलेख ‘मनुष्य की अन्तरात्मा को संबोधन’ न केवल उनके समग्र लघुकथा साहित्य को समेटने का प्रयास करता है बल्कि विधा के उत्थान और लघुकथा को पुख़्ता ज़मीन देने में रमेश बत्तरा के साहित्य का कितना गहरा प्रयास रहा, इस बात की भी विस्तृत विवेचना करता है। यह आलेख इस पुस्तक का सर्वश्रेष्ठ अंश कहा जा सकता है।

रमेश बत्तरा के साहित्य _सृजन (यथा संभव जितना वह एकत्र कर सके) पर स्वयं अशोक भाटिया द्वारा, विस्तारपूर्वक चर्चा करने वाला लिखा आलेख ‘लघुकथा की रचनात्मक धारा के प्रतीक’ उनके संपूर्ण साहित्य कर्म को न केवल एक स्थान पर पढ़ने का अवसर देता है; बल्कि अशोक भाटिया जैसे गहन दृष्टि वाले आलोचक की दृष्टि से उनके साहित्य की पड़ताल तथा विवेचित संदर्भ को पूरी तरह समझने का अवसर भी देता है।

‘रचना-संसार’ के अंतर्गत रमेश बत्तरा की जो चौबीस लघुकथाएँ प्रस्तुत की गई हैं, उनमें से मेरे द्वारा केवल दस लघुकथाएँ ही इस पुस्तक को मिलने से पहले पढ़ी हुई थी। और मुझे विश्वास है कि मेरी समकालीन पीढ़ी में से कुछ ही लोग ऐसे होंगे जिन्होंने रमेश बत्तरा की अधिकतर लघुकथाएँ पढ़ी या सुनी होंगी या यूँ कहें कि लघुकथा विधा से जुड़ा एक बड़ा वर्ग उनके साहित्य से आंशिक तौर पर अनजान ही रहा होगा।

रमेश बत्तरा के सीमित लेखन में भले ही विषयों की भिन्नता बहुत अधिक नहीं रही, लेकिन समाज में अपने आस पास के परिवेश पर उनकी दृष्टि हमेशा बनी रही। उनकी सूअर, वजह, राम रहमान और दुआ  जैसी लघुकथाएँ अगर उस समय के सांप्रदायिक माहौल और हिंसा-घृणा जैसे कथ्यों को साथ लेकर चलती हैं, तो ग़रीबी,आर्थिक विपन्नता और पिछड़ेपन के विषय पर उनकी लघुकथाएँ हालात, उसकी रोटी, अनुभवी, माँएँ और बच्चे उस दौर की इन विसंगतियों पर बहुत कुछ कह जाती हैं। रमेश बत्तरा ने अपनी लघुकथाओं नौकरी, निजाम, नागरिक में नौकरशाही को घेरा तो  बीच बाज़ार जैसी रचना में बेटी के कैबरे को अपनाने के विषय पर समाज का नैतिकता और  संपन्नता का दोहरा रूप सामने रखा। फ़ैशनपरस्ती और आधुनिकता के सवाल पर उनकी लघुकथा संदर्भ और शीशा आज भी उसी प्रश्न के साथ सामने खड़ी है, जैसे ये विसंगति रचना के सृजन काल में व्याप्त रही होगी।

उनकी लघुकथा नई जानकारी बाल मनोविज्ञान पर आधारित है तो स्वाद, चलोगे, खोज, सिर्फ हिंदुस्तान में तथा अंधे खुदा के बंदे जैसी रचनाएँ मानव विज्ञान के विभिन्न रूप सामने रखती हैं। उन्होंने युद्ध परिपेक्ष में सैनिक-पत्नि की भावनात्मक स्थिति पर लड़ाई जैसी रचना भी रची, तो प्रतीक रूप में सिर्फ़ एक तथा खोया हुआ आदमी जैसी मानव अंतर्मन के संघर्ष की व्यथा कहती रचनाएँ भी लिखी। और अंततः, चंद शब्दों में कही उनकी लघुकथा कहूँ कहानी का पंच; ‘एक लाजा है, वो बोत गलीब है’ तो लघुकथा साहित्य में एक मील का पत्थर ही बन चुका है। कहना न होगा कि उनकी लिखी लघुकथाएँ केवल लेखन की औपचारिकता भर नहीं रही, बल्कि एक मानक रूप में आदर्श लघुकथाओं की तरह साहित्य में स्थापित हुई।

‘आलोचना-संसार’ में रमेश बत्तरा के द्वारा विभिन्न समय-स्थानों पर लिखे गए पाँच दुर्लभ आलेख शामिल किए गए हैं, जो उस समय के साथ आज भी अपना महत्व दर्शाने में पूर्ण रूप से सक्षम होने के साथ सतत संग्रहणीय भी हैं। इनमें प्रथम आलेख लघुकथा नहीं, द्वितीय आलेख लघुकथा : किसलिए और क्यों ? और पंचम आलेख लघुकथा : बारीकी, सलीक़ा और करीना जहां लघुकथा (विधा) के अस्तित्व, अनिवार्यता एवं उसकी कार्यशैली पर अपनी बात कहते नजर आते हैं, वहीं तृतीय आलेख लघुकथा : संवेदना का सूत्र में लघुकथा के नाम से लेकर उसकी शब्द संख्या और रचना के औचित्य पर बात की गई है।

ठीक इसी तरह अपने आलेख लघुकथा की साहित्यिक पृष्ठभूमि : संदर्भ और सरोकार  में रमेश बत्तरा लघुकथा के स्वतंत्र अस्तित्व के संदर्भ में यह बताना नहीं भूलते कि लघुकथा और कहानी, भले ही दोनों एक ही विधा के रूप है लेकिन इनकी तकनीक इन्हें पूरी तरह से अलग करती है और लघुकथा विधा को स्वतंत्र अस्तित्व दिलाने के लिए हमें उसकी तकनीक को विकसित करने का हर संभव प्रयास करना ही होगा। एक मायने में देखा जाए तो इस आलेख में वर्णित स्पष्टीकरण वर्तमान पीढ़ी के सामने कहानी और लघुकथा के बीच के संशय को दूर कर उसकी सही स्थिति स्पष्ट करने का प्रयास करता है।

इस पुस्तक के अंत में, गौरीनंदन सिंहल द्वारा रमेश बत्तरा से लिए गए साक्षात्कार लघुकथा-विषयक लंबी बातचीत को इस पुस्तक का विशेष आकर्षण कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगा। साक्षात्कार में गौरीनंदन द्वारा किए गए प्रश्नों के उत्तर सहज ही रमेश बत्तरा की उस बेबाकी की पुष्टि करते है जिस के लिए ‘वे’ अपने करीबी लोगों में जाने जाते थे। लघुकथा से जुड़े (शब्द संख्या,लघुकथा की विशेषता जैसे) कई प्रश्नों के उत्तर, आज कई वर्षों के बाद भी विधा से जुड़े हर लेखक के लिए एक तर्कसंगत विचार के रूप में दिशा निर्धारण का उदाहरण बन सकते हैं।

बहरहाल समग्र रूप से यदि इस कृति पर एक संक्षिप्त टिप्पणी की जाए, तो ये कहना श्रेयस्कर होगा कि अशोक भाटिया जी ने अपने शब्दों से न केवल रमेश बत्तरा की विस्मृत होती यादों को हमेशा के लिए पुस्तक रूप में संरक्षित कर लिया है बल्कि वर्तमान और भावी पीढ़ी को भविष्य के लिए एक श्रेष्ठ उदाहरण के साथ एक महत्वपुर्ण दस्तावेज़ भी सौंप दिया है।
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. . . विरेंदर ‘वीर’ मेहता ईस्ट दिल्ली – 92

सवाल दर सवाल (रमेश बत्तरा),संपादन  – अशोक भाटिया,प्रकाशक – भावना प्रकाशन, दिल्ली – 91,पृष्ठ: 122,मूल्य : ₹ 175/- संस्करण: 2022

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