होली एक समरसता का त्योहार है। प्रेम और धार्मिक सौहार्द को यह त्योहार बढ़ाता है।
‘‘मम्मी! ओ मम्मी! आगे क्या लिखूँ? कुछ समझ में नहीं आ रहा है?’’अपनी नोटबुक पर निबंध लिखते हुए विवेक अधीरता से बोला, ‘‘आज ही यह होली पर निबंध पूरा करके ऑनलाइन एक कम्पीटीशन में भेजना है…’’ -पाँचवी कक्षा में पढ़ने वाला विवेक, अपनी माँ से जिद करके पूछ रहा था।
अपने काम में लगी माँ से, जब यह सवाल विवेक ने किया, तो उसको जैसे शॉक सा लगा। बदरंग यादों के दरीचे पर्त-दर-पर्त खुलते चले गये।
तब उसकी शादी का वह चौथा साल लगा था। उस दिन, होली का दिन था। पति कहीं काम से गए थे। सास भी कहीं गईं थीं। दो साल का विवेक अपने खेल में मस्त था। घर के काम में वह व्यस्त थी, तभी घर की कुंडी बजी। खिड़की से झाँका तो रंग गुलाल से सराबोर उसके दूर के, रिश्ते के तीन देवर नमूदार हुए, “ हा.. हा.. हा.. भाभी दरवाजा खोलो—”
अनुनय-विनय शुरू की, “….नहीं नहीं तुम्हारे भैया नहीं हैं? फिर आना कभी?”
“अरे! अरे! आप तो खामखा नाराज हो रहीं हैं। होली है, इतनी दूर से आएँ हैं हम। भला आप के पैर छूए बगैर कैसे चले जाएँगे।”
“…नहीं नहीं फिर आना कभी? घर में अभी कोई नहीं है।”
“आप की कसम रंग बिलकुल नहीं लगाएँगे हम..” -बच्चों सा गिड़गिड़ाने लगे वे।
स्त्री हृदय पिघल गया। दरवाजा खोला, चट-पट हुरियारे अंदर आ गए। हा हा हा…
“नहीं नहीं, देखो मैंने पहले मना किया था, रंग न लगाना, देखो रंग न लगाना,बाकी सब ठीक है.. हमसे बुरा कोई न होगा..”
झीनाझपटी-धींगामुश्ती शुरू हुई.. फिर एक ने दोनों हाथ पकड़े, एक ने पैर, गिरा दिया एक कमजोर चिड़िया को। फिर फिर रंग रंग रंग..। वह गिड़गिड़ाती रही, तड़पती रही, पैर छूने वाले, आशीर्वाद माँगने वाले, देवर अपनी भाभी के जिस्म के हर हिस्से पर….
“…होली… होली…है….”
‘‘मम्मी! ओ मम्मी! कसके विवेक ने झिझोड़ा तो उसकी तंद्रा भंग हुई। यादों की गहरी चुभन टीस लिये वह बोली-लिखो इस समरता के त्योहार को कुछ लुच्चे -लफंगे गंदा कर देते हैं। कुछ आवारा शोहदों ने इसे बिलकुल घिनौना बना दिया है…इसलिए महिलाओं को होली में हुड़दंगियों से बचना चाहिए.. विवेक निबंध पूरा करते हुए एक बारगी कनखियों से माँ को देखा। उनकी आँखों में जल की एक महीन रेखा न जाने क्यों उभरती चली आ रही थी, जिसे वह समझ पाने में अक्षम था।
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