समय परिवर्तन के साथ समाज बदलता है और उसी के अनुसार कला और साहित्य का स्वरूप भी बदलता है। सामंती समाज में जब लोगो के पास अवकाश का
समय था ,तब महाकाव्यों एवं प्रबंध काव्यों की रचनाएँ हुईं। लम्बे समय तक गाए जानेवाले शास्त्रीय संगीत का ही बोलबाला था। लेकिन जब समय बदला तो साहित्य और कलाओं का स्वरूप भी बदला। यातायात के विविध साधनों ने राष्ट्रों के बीच की दूरियाँ कम कर दी। विश्व के हर कोने तक आवागमन शुरू हुआ। परिणामस्वरूप साहित्य और कलाओं का स्वरूप भी बदला। कलाओं में कोलाज, संगीत में फ्यूजन और साहित्य में क्षणिकाओं, लघुकथाओं और हाइकु का लिखा जाना वैश्विक धरातल पर आदान-प्रदान के साथ-साथ भागती हुई जिंदगी की जरूरत बना।
आज लोगों के पास इतना समय नहीं है कि वे महाकाव्य एवं प्रबंध काव्य की रचना कर सकें और उसे पढ़ सकें। भागती हुई जिंदगी के मर्म को छूने और उन्हें एक वैचारिक आयाम देने के लिए रचनाओं का लघु कलेवर में लिखा जाना आज की जरूरत है। यही कारण है कि आज लघुकथाएँ सर्वाधिक लिखी और पढ़ी जा रही हैं। मानवीय संवेदनाओं के विविध पक्षों को स्पर्श करने एवं उसे कलात्मकता के साथ भलीभाँति रूपायित करने में आज लघुकथा एक सशक्त विधा बन चुकी है। वही रचनाएँ आने वाले समय में स्वीकारी जाएँगी जो मनुष्य के मनोभावों के साथ सामंजस्य बैठा सकें और उसे वैचारिक दिशा दे सकें ।
हिन्दी कहानी-लेखन के साथ लघुकथाएँ भी लिखी गईं लेकिन तब वे अपनी पहचान नहीं बना पाईं। उपन्यास, कहानी और नाटक ही लोकप्रिय हुए। परंतु आज कथा के क्षेत्र में लघुकथाएँ केंद्रीय विधा का स्थान लेने जा रही हैं। लघुकथाओं को लोकप्रिय बनाने में प्रकाशन तंत्र की उल्लेखनीय भूमिका है। पत्र-पत्रिकाओं के साथ-साथ नेट की दुनिया में ई-मैगजीन के द्वारा भी लघुकथाएँ सर्वाधिक लिखी और पढ़ी जा रही हैं। आज सुकेश साहनी,रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’,सतीशराज पुष्करणा,बलराम, सुभाष नीरव , अशोक भाटिया आदि अनेक लेखकों के योगदान को लघुकथा के लिए सराहा जा रहा है।
इनके प्रयासों ने ही आज पाठकों को लघुकथा पढ़ने, लिखने और उस पर विचार व्यक्त करने का सामर्थ्य प्रदान किया है।
लघुकथाओं में मेरी पसंद की लघुकथा में – पेंशनर-मुरलीधर वैष्णव और प्रियंका गुप्ता की लिखी लघुकथाएँ ‘भूकंप’ सर्वाधिक सशक्त और प्रभावशाली लगी।
। अवकाश प्राप्त सरकारी कर्मचारी को अपनी ही जमा रकम एवं पेंशन के लिए अपने ही सरकारी तंत्र से कितना जूझना पड़ता है , को बखूबी बयान करती है मुरलीधर वैष्णव की लघुकथा ‘पेंशनर’। बैंक मैनेजर मामूली सी औपचारिकताओं को पूरा करने में कितनी हीला-हवाली करता है। रिटायर्ड कर्मचारी अपनी लड़की की शादी के लिए अपना ही फंड पाने के लिए परेशान हो जाता है। अंत में जब वह मरने-मारने पर उतारू हो जाता है तो टाल-मटोल करने वाला वही बैंक मैनेजर उसकी सारी धनराशि का शीघ्र भुगतान कर देता है।प्रश्न उठता है कि क्यों सरकारी तंत्र इतना निष्क्रिय और निष्ठुर हो जाता है ? इस लघुकथा का यह वाक्य ‘ईमानदारी और तंगी का चोली दामन का संबंध है ’अत्यंत ही मर्मस्पर्शी है। लघु कलेवर में होने के साथ ही साथ अपने प्रभाव में भी यह लघुकथा पूर्णतः सक्षम हैं जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करती हैं ।
प्रियंका गुप्ता की लघुकथा ‘भूकंप’ आज के क्षरित मूल्यों की कथा है। युवा पति-पत्नी का अपनी जान बचाकर घर से बाहर भाग जाना और बूढ़े पिता को बचाने का ध्यान आते ही ठिठक जाना और उन्हें बचाने का प्रयास न करना तथा यह सोचना कि अगर वे इसी बहाने मर जाते तो हम लोगों को उनकी सेवा न करनी पड़ती,गू-मूत करने से जान बच जाती, मन ही मन खुश होना और उसी समय अपने दूधमुँहे बच्चे का ध्यान आने पर उसे बचाने के लिए छटपटाना,चीखना और काँप जाना आदि मनःस्थितियों को प्रियंका गुप्ता की लघुकथा ‘भूकंप’ बड़ी ही कुशलता से व्यक्त करती है। अंत में वही बूढ़े पिता दुधमुँहे बच्चे को बचाकर अपनी व्हीलचेयर पर बैठकर बाहर लाते हैं। जिन पिता को उनके बेटे और बहू ने कुछ क्षण पहले मरने के लिए सोचा था। वास्तव में यह लघुकथा वर्तमान स्वार्थी युवा पीढ़ी की कुत्सित सोच पर बखूबी चोट करती है।
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1-पेंशनर-मुरलीधर वैष्णव
उसे रिटायर हुए कोई पांच महिने बीत गये थे. अभी तक पेंशन ग्रेच्युअटी आदि के नाम पर उसे एक धेला भी नहीं मिला था. अब तक की गई छोटी-मोटी बचत भी घर खर्च में काम आ गई थी. इधर बेटी की शादी तय हो गई वह अलग. उसे यह तो मालूम था कि ईमानदारी और तंगी का चोली-दामन का साथ है ;लेकिन उसकी हक की बकाया रकम मिलने में भी इतनी परेशानी होगी यह उसने नहीं सोचा था. उसका धैर्य चुकने लगा था.
इधर सरकार ने आदेश जारी करने में कुछ महीनों की देरी कर दी तो उधर सम्बन्धित बैंक में सरकारी आदेश प्राप्त हो जाने पर भी उसे पेंशन तक नहीं मिल रही थी. पेंशन ग्रेच्युअटी आदि मिला कर कोई दस लाख रुपयें की रकम बैंक ने रोक रखी थी.
’’आप मेरी बकाया रकम क्यों नही दे रहे हैं? आखिर क्या चाहते है आप?’’ एक दिन वह बैंक मैनेजर से भिड़ ही पड़ा.
’’देखिये, बडी रकम का मामला है. सरकारी आदेशों का सत्यापन हमारे हेड आफिस से होता है. मामला अभी प्रोसेस में है. हो जायगा चार पाँच दिनों में ’’मैनेजर ने उसे शांत करना चाहा.
चार पाँच दिनों की जगह पन्द्रह दिन बीत गए। इस बार वह दनदनाता हुआ बैंक मैनेजर के कक्ष में घुसा. उसकी आँखों से अंगारें बरस रहे थे. उसने बिना कुछ बोले अपनी पास बुक बैंक मैनेजर के सामने रख दी. बैंक मैनेजर ने उसकी ओर देखा और स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उसने अपने हाथ का काम छोड़कर पहले उसके पेंशन खाते का विवरण कम्प्यूटर पर देखा.
’’आपके पेंशन आदि आदेशों का सत्यापन तो हो चुका है. लेकिन एक प्रॉब्लम है’’ ’’अब क्या?’’
’’आप गत इकतीस अक्टूबर को रिटायर हुए थे। ओह! क्या मनहूस तारीख है! आप तो जानते हैं उस दिन इंदिरा गाँधी की…………….खैर, बात यह है कि हर नवम्बर में पेंशनर को अपने जीवित होने का प्रमाण पत्र देना होता है. आपने नहीं दिया. इसलिए, रकम-भुगतान पर ऊपर से रोक लगी हुई है. सॉरी……………..‘‘
’’क्या? अब आपको मेरे जीवित होने का प्रमाण चाहिए? पिछले पाँच महिनों से आप ही के बैंक से मेरे बचत खाते में जमा मामूली पूँजी में से घर खर्च के लिए थोड़ी थोड़ी रकम मैं उठाता रहा हूं. और आज फरवरी में आप मुझे कह रहे हैं कि मैं गत नवंबर में जीवित था या नहीं?
“अब यह तो नियम की बात है. आप अभी प्रमाण पत्र दे दीजिए दस-पन्द्रह दिनों में आपका भुगतान क्लियर हो जायगा’’.
पेंशनर का माथा भन्ना उठा. उसने अपने थैले में से अचानक पिस्तौल निकाली और अपनी कनपटी पर रखते हुए बोला-“मैं आपको अपने जीवित होने का प्रमाण-पत्र अभी देता हूं. सिर्फ पन्द्रह मिनट है, आपके और मेरे पास, मिस्टर मैनेजर..!………..ठीक तीन बजकर पन्द्रह मिनट बाद मेरी लाश यहाँ पड़ी मिलेगी और आपको प्रमाण पत्र मिल जायगा कि पन्द्रह मिनट पहले तक मैं यहाँ जीवित था’’
’’रुको रुको…..भाई! ऐसा मत करो, मै अभी कुछ करता हूं’’ मैनेजर ने काँपते हाथों से तुंरत फोन लगा कर अपने हेड -आफिस बात की. अपने बॉस से टेलिफोनिक अप्रूवल लेकर उसने तुरंत ही उस पेंशनर के बैंक-खाते में उसकी बकाया रकम दस लाख तेईस हजार पाँच सौ रुपये क्रेडिट कर दिये.
’’अब तो ठीक है. बस, इस फार्म पर आप दस्तखत कर दें’’ पेंशनर को उसकी पास बुक थमाते हुए मैनेजर के हाथ अभी भी काँप रहे थे.
’’ यह आपके बच्चेां के काम आएगी’’ पेंशनर ने फार्म पर दस्तखत करने के बाद मैनेजर की टेबल पर पिस्तौल रखते हुए कहा. वह एक ब्रांडेड कंपनी की खिलौना- पिस्तौल थी.
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2-भूकम्प-प्रियंका गुप्ता
अभी वह ऑफिस जाने की तैयारी में लगा ही था कि सहसा बदहवास सी पत्नी कमरे में आई,”जल्दी बाहर निकलिए…। बिलकुल भी अहसास नहीं हो रहा क्या…भूकंप आ रहा । चलिए तुरंत…।” वो उसकी बाँह पकड़ कर लगभग खींचती हुई उसे घर से बाहर ले गई ।
पत्नी को यूँ रुआंसा देख कर जाने क्यों ऐसी मुसीबत की घड़ी में भी उसे हँसी आ गई । बाहर लगभग सारा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया था । एक अफरा-तफरी का माहौल था । कई लोग घबराए नज़र आ रहे थे । कुछ छोटे बच्चे तो बिना कुछ समझे ही रोने लगे थे ।
सहसा उसे बाऊजी की याद आई । वो तो चल नहीं सकते खुद से…और इस हड़बड़-तड़बड़ में वह उनको तो बिलकुल ही भूल गया । वो जैसे ही अंदर जाने लगा कि तभी उसके पाँव मानो ज़मीन से चिपक गए । बाऊजी की ज़िन्दगी की अहमियत अब रह ही कितनी गई है । वैसे भी उनका गू-मूत करते करते थक चुका था वो…और उसकी पत्नी भी…। ऐसे में अगर भूकंप में वो खुद ही भगवान को प्यारे हो जाएँ तो उस पर कोई इलज़ाम भी नहीं आएगा ।
अभी कुछ पल ही बीते थे कि सहसा पत्नी की चीख से वो काँप उठा । उनका दुधमुँहा बच्चा अपने पालने में ही रह गया था ।
अंदर की ओर भागते उसके कदम वहीं थम गए । वह गिरते-गिरते बच गया था। एक हाथ से व्हील चेयर चलाते बाहर आ चुके पिता की गोद में उसका लाल था ।
जाने भूकंप का दूसरा तेज़ झटका था या कुछ और …पर वह गिरते-गिरते बच गया था।
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