अनुवाद; रश्मि विभा त्रिपाठी
“लेउ लखहु, सुरुज मूड़े प आन ठाड़ भा हवै अउर महारानी कै अबै दुपहर क जेवनारि कै तयारिही नाहीं सुरू भै।” खँघारे बर्तन क झउआ उठाए लीन्हे जाति छुटक्की काकी का लखि अजिया बहोरि करेर अबाज माँ सुरू हुइ गईं रहैं।
खुले अँगना माँ टापू ख्यालति मुन्नी अचक्के रुकि गै। बहोरि पता नाहीं का गुनति डुगुरति अजिया क पलंग क नेरे आन ठाड़ भै।
“अजिया आपु छुटक्की काकी प काहे अललावति रहति हौ?”
अब मुन्नी रहइ अजिया केरे सबते कमासुत अउर साच्छात लछ्मी बहुरिया कै अक्यालि दुलारी बिटेवा त अजिया जिउ करइ तहूँ भला कइसन झिरकि सकती रहैं वहिका।
अवाज माँ जतन ते मिसरी घोरति भाखिन्ह, “अरे बिटिया तुम न बूझिहौ। ई कुलच्छिनी पाँउँ धरिसि नाहीं अंगना माँ कि भच्छि गै तुम्हरे छुटक्के काका का।”
“भच्छि गै” मुन्नी कै आखीं असमंजस माँ भरि तनी अउर बाढ़िन्ह।
“अरे चले गे ना तुम्हरे काका हम पंचन का छाँड़ि” अजिया भाखिन्ह जनौं रोवनउक माँ अललावति अस।
“अच्छा” … छिन का सोच माँ बूड़ी अस ठाड़ रहिसि मुन्नी बहोरि अजिया केरे मुँहि प दीठि गड़ाक भाखिसि,
“प बुऔ त फिरि फूफा जी का भच्छि कइ आइनि हवैं”
अउर आपन ते सटाक बइठारी बिटेवा केरे मूड़े प तेल ठौंकइ जाति अजिया क्यार हाँथु हवा मइहाँ रुकै रहि गा।