(अनुवाद :सुकेश साहनी)
“बहुत पहले… जब समुद्र में ज्वार था,” एक आदमी ने दूसरे से कहा, “मैंने लाठी के सिरे से रेत पर एक पंक्ति लिखी थी-लोग उसे पढ़ने के लिए अभी भी रुक जाते हैं और ध्यान रखते हैं कि कहीं मिट न जाए.”
“मैंने भी रेत पर एक लाइन लिखी थी,” दूसरे आदमी ने बताया, “…पर उस समय समुद्र उतार पर था, लहरों ने उस लिखे को धोकर रख दिया। लेकिन तुमने क्या लिखा था?”
“मैं ही ईश्वर हूँ!” पहले आदमी ने उत्तर दिया,
“और तुमने क्या लिखा था?”
“मैंने लिखा था-मैं इस समुद्र की एक बूँद के सिवा कुछ भी नहीं हूँ।” दूसरे आदमी ने बताया।
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