हरभगवान चावला कविता, कहानी और लघुकथा के प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। हरभगवान चावला भाषा के अच्छे जानकार हैं और इनका अध्ययन बेहद विस्तृत है। हरभगवान चावला सिर्फ भाषा के ही नहीं, भाव के भी प्रबल चितेरे हैं। लघुकथा के वे प्रयोगवादी लेखक हैं। लघुकथा के तय मानकों से आगे जाकर उन्होंने लघुकथा का अपना शिल्प और अपने मानदंड स्थापित किये हैं। अपनी बात या कथ्य को बिंबों के माध्यम से कहना शास्त्रीय साहित्य कहलाता है और हरभगवान चावला ने यह प्रयोग लघुकथा में किया है! हरभगवान चावला की लगभग हर लघुकथा कविता जैसी लगती है। वह कविता की तरह शास्त्रीयता सहेजती है, भाव सहेजती है, लाउड नहीं होती और पाठक को उद्वेलित करती है लेकिन मारकता उसमें लघुकथा वाली ही रहती है।
प्रस्तुत लघुकथा में हरभगवान चावला जी ने कवि होने की और कवि बनने की स्थिति को बिम्ब के माध्यम से चित्रित किया है। पहली ही पंक्ति में इस बात का इतना सूक्ष्म ध्यान रखा है कि दरबारी कवि राजदरबार के बाहर “हाथ बाँधे” खड़ा है।
कवि एक तरह से स्वयं से साक्षात्कार करने वाला विशेष मनुष्य होता है, जैसे साधु के बारे ऐसा प्रचलित है। लेखक या कवि राजसत्ता से लाभ लेने से हमेशा गुरेज करता है। लेखक दरअसल होता है, जबकि कुछ लोग लेखक बनते हैं। होने और बनने में यही सूक्ष्म अंतर है। मुंशी प्रेमचंद जी को काला कांकर रियासत के नरेश ने इलाज के लिए सहायता भेजी थी, लेकिन उन्होंने इलाज तक की सहायता लेना गवारा नहीं समझा। अलवर के नरेश ने उन्हें राजमहल में आकर रहने का प्रस्ताव भेजा। मुंशी प्रेमचंद जो कह पाए वह उनकी आत्मशक्ति थी जो उन्होंने कभी राजदरबारों में गिरवी नहीं रखी। आप अपना कहन ही अगर कहीं गिरवी रख देंगे तो लेखक होने की बजाय कुछ और हो जाइए न ! लेखन में और लेखक में लिजलिजापन कितना फिसलन वाला होता है यह पाठक भी समझता है और जिन पर स्तुतियाँ लिखी जा रही हैं वह भी समझते हैं। इसीलिए ऐसे कवि दरबार में प्रवेश पा भी लेंगे तो आपको हाथ बांधे ही खड़े मिलेंगे। इनकी अपनी रीढ़ नहीं होती ये स्तुति वाले की रीढ़ के सहारे खड़े होते। जो लेखक हाथ बांधे खड़े मिले समझिए वह लेखक बनने के गणित में है। लेखक होना कुछ और है दरअसल।
प्रस्तुत लघुकथा में कवि के अतिरिक्त दूसरा पक्ष वह है जिस पर स्तुति लिखी जानी है। वह किताबें पढ़ता ही नहीं, वह कविता तो कतई नहीं पढता, लेकिन कविता की शक्ति जानता है। कविता जो सत्ता की पेशानी पर चिंता की लकीर खींच देती है उस शक्तिशाली अस्त्र को किसी के शरणागत कर देना लेखक का अक्षम्य अपराध है और इस अपराध के बदले वह फौरी इनाम बेशक ले ले , मौद्रिक लाभ बेशक ले ले, लेकिन उसका नैतिक रुतबा बौना हो जाता है, उसके भीतर का लेखक धीरे-धीरे मरना शुरू हो जाता है और फिर वह सिर्फ अपच लिखता है । उसका अपना कोई मत नहीं होता, वह सत्ता के मद और मत को ही जस्टिफाई करता है।
राजा या सत्ता जो कविता नहीं सुनती, कविता नहीं पढ़ती वह असल कवि से खौफ खाती है। अनेक कवि ऐसी सत्ता में जेल में होते हैं या राजनातिक षड्यंत्रों में फँसाएँ जाते हैं। हरभगवान चावला प्रस्तुत लघुकथा में इस बात का जिक्र भी करते हैं, तो जब ऐसे दौर आते हैं और रीढ़ वाले कवि जेलों में डाले जाते हैं तो दरबारी कवि क्या सोचते होंगे?! कैसा सोचते होंगे, वे अपने भीतर को किस तरह मनाते होंगे, जब जेल में डाले गए कवि के लिए दुनिया रोष प्रकट करती है, तब दरबारी कवि के मन पर क्या गुजरती होगी। कितने द्वंद्व में से निकल कर कितने द्वंद्व कुचल कर वह दरबारी बना होगा; क्योंकि द्वंद्व से ही कविता निकलती है और आपके द्वंद्व तो चाटुकारिता के तले दब गए, आप तो अपने द्वंद्व तक लिखने के लिए स्वतंत्र नहीं कि अनजाने ही कोई शब्द सत्ता की खिलाफत में न लिखा जाए , ऐसे कवि कविता के अघोषित शत्रु होते हैं ।
हरभगवान चावला ने अपनी लघुकथा के क्लाइमेक्स में जो लिखा है, वह एक पंक्ति लघुकथा की मारकता को उसके उत्कर्ष पर ले जाती है। हाथ बांधे खड़े लेखक, बनने आये लेखक दरअसल हाथ बाँधकर कुछ बनने की कोशिश में कलम को गिरवी रखते हैं। लेखक बना नही जाता ;क्योंकि लेखन कैरियर नहीं होता।लेखन व्यक्तित्व का उत्कर्ष है , लेखन होने का उत्कर्ष है लेखन आज़ादी की चाहना का उत्कर्ष है लेखन आईना है जो लेखक समाज को दिखाने से पहले खुद देखता है। और सुना है, राजदरबार में आईने नहीं होते।
सुरेश बरनवाल बेहतरीन कहानीकार हैं। लघुकथा की विधा में कहानीकार अक्सर गच्चा खा जाते हैं; क्योंकि लघु कथ्य में कहना उनकी प्रैक्टिस और व्यवहार में नहीं होता। कुछ कहानीकार अपनी कहानी में अनेक लघुकथा कह जाते हैं। कहन को अलंकृत करने की यह कला बहुत रेयर है; लेकिन इस कला से कहानी की सुंदरता और गहराई बढ़ती है और कहानी कालजयी होने के गुण से आप्लावित होती जाती है। सुरेश बरनवाल की कहानी विधा ऐसे ही चलती है और आंप उनकी एक कहानी में अनेक लघुकथाओं के प्लाट पाते हैं।
इस पोर्टल के लिए लघुकथा चुनते वक्त मुझे खलील जिब्रान रहकर रहकर याद आ रहे थे कि उनकी किसी लघुकथा पर गहरी समीक्षा लिखी जाए ,लेकिन फिर मैंने सोचा कि खलील जिब्रान पर कहने वाले बहुत लोग हैं, खलील जिब्रान जैसी किसी अन्य रचना को क्यों न संज्ञान में लाया जाए।
‘ढोल’ लघुकथा को पढ़ते वक्त आपको खलील जिब्रान स्मरण नहीं हो आते? जो कम शब्दों में दार्शनिक होते हुए एक चीख नुमा कोई टीस हमारे भीतर छोड़ जाते हैं जो रह-रहकर भीतर बजती है टीसती है। मुंशी प्रेमचंद ने ‘कफ़न’ कहानी में भूख का एक विकराल और रेयर चित्रण किया है। कफन कहानी पर कोई समर्थ समीक्षक ही समीक्षा लिख सकता है। मुझे लगता है, भूख का चित्रण और भूख के चित्रण की समीक्षा भूख को देखे-महसूस किए बिना नहीं हो सकती। खाली पेट का ढोल बजता है यह भूखा ही बता सकता है, और भूख की वीभत्सता देखकर वही फट सकता है जिसने भूख को जिया है। मुझे यह लघुकथा अक्सर उद्वेलित करती है; हालांकि मैंने इस तरह की भूख नही देखी, वस्तुतः इसकी समीक्षा भी मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर की चीज़ है।
कम शब्दों में बड़ी बात कहना दरअसल लघुकथा का विशेष गुण है जिसका इस लघुकथा ने निर्वहन किया है। लघुकथा में सुरेश बरनवाल खलील जिब्रान जैसी मारकता के साथ हाजिर हैं। भूख पर जीवन और राजनीति में कोई भाषण प्रवचन या शिक्षा नही दी जानी चाहिए, भूख का उपाय बताया जाना चाहिए। छोटी सी लघुकथा में लेखक इतना बड़ा ख्याल रखता है कि भूख पर भाषण नही पेलता, राजनीति यह बात कब सीखेगी।
-0-
1 – शत्रु / हरभगवान चावला
-एक कवि आपसे मिलने के लिए द्वार पर हाथ बाँधे खड़ा है महाराज, आज्ञा हो तो उसे दरबार में आने दिया जाए?
-कवि! हमसे मिलने के लिए आया है, आश्चर्य ! ये कवि कहे जाने वाले प्राणी तो जैसे पैदा ही राजाओं की निंदा के लिए हुए हैं।
– पर यह कवि वैसा नहीं है महाराज ।
– कवि तो है न ! तुम क्या नहीं जानते कि हम कवियों से और कवि हमसे कितना चिढ़ते हैं। कितने कवि हमारे कारागार में बंद हैं, कितनों पर मुक़दमे चल रहे हैं , कितनों से हमारे दरबारी अपने स्तर पर निपट रहे हैं ।
– जानता हूँ महाराज, पर इस कवि ने आपकी प्रशस्ति में कई चालीसे लिखे हैं, अब महाकाव्य लिखने की तैयारी में हैं । इस कवि ने प्रजा के बीच आपको अवतार के रूप में स्थापित करने का प्रण किया है । कहता है, महाकाव्य के प्रणयन से पूर्व महाराज के दर्शन की आकांक्षा है।
-दर्शन की बात तो हर कोई करता है, उसके आने का वास्तविक प्रयोजन क्या है?
– वह आपको अपनी लिखी कविता की किताबें भेंट करना चाहता है ।
-किताबें! हा.. हा . हा .. हमने आजतक कोई किताब पढ़ी है क्या? कविता के तो हम घोषित शत्रु हैं!
– कविता का तो शत्रु वह भी है महाराज, अघोषित ही सही।
-0-
2- ढोल / सुरेश बरनवाल
बापू भूख लग रही है
बेटा, कल खाना खाएंगे
तो आज क्या करूँ बापू, रहा नहीं जा रहा
“आज इस खाली पेट का ढोल बजा”, कहकर गरीब पिता ने अपने खाली पेट पर दोनों हाथों से थपकी मारते हुए मुँह से ढोल की आवाज निकालने का कोतक शुरू किया ।
भूख से त्रस्त बेटा अपंनी उदास आँखों से अपने पिता के इस अजीब कोतक को देखता रहा फिर वह भी अपने पेट पर हाथ मारते हुए ढोल की आवाज निकालने की कोशिश करने लगा ।
यह देख पिता के मुँह से निकलते ढोल की आवाज फट गई ।
-0-