चार माह गुज़र चुके थे इस पुलिस चौकी पर आए। मगर अभी तक पुलिस चौकी के इलाके़ में पूर्णतया शांति क़ायम थी। कहीं से भी किसी अशुभ वारदात की कोई सूचना अभी तक आप्राप्त ही थी। इससे पुलिस कर्मियों का चिंतित होना लाज़िमी था। चार महीने से आमदनी का ज़रिया जो बंद हो गया था। बेचैनी ने जब ज़्यादा ज़ोर मारा तो दिल की कसम होंठों पर तैरने लगी। चौकी इंचार्ज ने ऑंखें सिकोड़ते हुए अपने अधीनस्थ मुख्य आरक्षी से कहा, ‘‘यार दिवान जी, यहाँ के बदमाशों को क्या हो गया है। देखो हरामज़ादे घर बैठे-बैठे मक्खियां मार रहे हैं। लगता है निकम्मे किसी काम के नहीं रहे।’’
‘‘आप ठीक फ़रमा रहे हैं साहब, लग रहा है साले अपराध करना ही भूल गए हैं। या कहीं से मोटा हाथ मार कर लाए हैं, पहले उसे पचा रहे हैं।’’
-हा-हा के ठहाके के साथ दीवान जी ने भी दरोग़ा जी की हाँ में अपनी हाँ मिला दी। इससे दरोग़ा जी के अंदर का दर्द द्रवित होकर फिर टपका, ‘‘देख भाई मैं तो इस बेकार चौकी पर से अपना स्थानांतरण करा लूँगा। जब इस पुलिस चौकी पर इंकम का कोई ज़रिया ही नहीं है तो फिर इस स्थान पर तैनात रहने से क्या फ़ायदा। जब तक इलाके़ में अपराध नहीं होगा अशांति नहीं फैलेगी तब तक हमारी आमदनी भी बंद रहेगी। शांति हमारे आमदनी के ज़रिए के लिए घातक है। यह हमारी इंकम के रास्ते को अवरूद्ध ही करती है।’’
‘‘ठीक है साहब अब तक आपकी इजाज़त की ही आवश्यकता थी। अब वह मिल गई। आप फ़िकर न करें, आमदनी का ज़रिया चालू हो जाएगा, आप निश्चिंत रहे।’’ यह शब्द कहते हुए दीवान जी मुस्कराए।