
“चल छोरी दुकान समेटवा “पार्वती ने अपनी बेटी रुक्मा को आवाज़ दी।
रुकमा ने कहा “अम्मा ,एक लक्ष्मी जी की मूर्ति रह गई है बाक़ी सब बिक गई।”
पार्वती ने कहा “हां !तो उसको रहने दे कल लक्ष्मी पूजन में रखेंगे, बाक़ी सब समेट ले “।
रुकमा मिट्टी के बाक़ी बचे दीए, कंदील, लड़ियाँ व अन्य सामान बटोरने लगी। लक्ष्मी जी की मूर्ति को अख़बार में लपेटकर एक तरफ़ रख दिया। सारा सामान चादर में भरने के बाद पार्वती पैसे गिनने लगी ।
तभी एक कार फुटपाथ पर उसकी दुकान के समीप आकर रुकी। पार्वती ने पैसे गल्ले में रख सवालिया नज़रों से उस कार सवार की तरफ देखा।
कार से उतरते हुए वह कार सवार बोला- “मुझे लक्ष्मी जी की एक मूर्ति चाहिए अम्मा!”
पार्वती बोली-“आगे की दुकान से ले लीजिए सेठ जी, मेरे पास की सारी बिक गईं।”
वह सेठ बोला-“आगे की दुकानों से ही इधर आया हूँ। मुझे दरअसल मिट्टी की मूर्ति ही चाहिए । और आगे की दुकानों पर मिट्टी की मूर्तियाँ नहीं हैं।”
कुछ सोचकर पार्वती अख़बार से लक्ष्मी की मूर्ति निकालने लगी, तो रुकमा बोली- “अम्मा ,यह कल अपने घर के लिए रखी है।”
पार्वती बोली-:बेटा ,जो माटी की कदर करना जानता है, उसके लिए मैं यह मूर्ति देने के लिए भी तैयार हूँ । धूप कड़क है । एक बार फिर मिट्टी में हाथ सान लेंगे , बना लेंगे एक नई मूर्ति!” इतना कहकर उन्होंने लक्ष्मी जी की वह मूर्ति उस सेठ को थमा दी।
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