जून 2026

संचयनलघुकथाएँ     Posted: January 1, 2023

1-अल्सर 

आधा पानी और ठंडा दूध मिलाकर वह अपने पेट दर्द का इलाज करती रही। जब सहन नहीं हुआ तो फिर सास के नुस्खों को आजमाने लगी।  दर्द हद से ज्यादा गुजर जाने पर,आज उसके पति ने डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने एन्डोस्कोपी से मुआयना कर बताया कि इनके पेट में छाले हो गए हैं। दवाइयों और परहेज से ठीक हो जाएँगे। परहेज में इतना ही बताया कि गर्म चाय नहीं पीना है और मसालेदार तथा गर्म भोजन नहीं करना है।

उसकी आँखों में पानी भर आया,घर आकर उसकी रुलाई नहीं थम रही थी । उसने अपनी माँ को फोन लगाया, रोते हुए बताया, “यहाँ आने के बाद कभी गर्म चाय नहीं पी पाई। सभी को चाय नाश्ता देते- देते तो मेरी चाय ठंडी हो ही जाती थी। तुम्हारे हाथ की चटपटी सब्जी और गर्म रोटी तो अब स्वप्न में भी नहीं मिलती। तुम्हीं बताओ माँ यह परहेज तो मैं वर्षों से कर रही हूँ, अब और कौन, कैसा परहेज करूँ?”

 माँ ने ढाढस बँधाते हुआ कहा “बेटी डॉक्टर को नहीं मालूम है कि तुम अन्नपूर्णा हो। सभी को भोजन कराने के बाद ही अपनी थाली उठाती हो। ज्यादा देर भूखे रहने से यह बीमारी हो गई।”

“पर माँ यहाँ क्यों किसी को यह बीमारी पकड़ में नहीं आई। यह अल्सर और कितना फैलेगा।”

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2-फ़ितरत 

विक्रम बियाबान जंगल में नंगी तलवार लिये चला जा रहा था। झींगुरों की झनकार तथा पत्तों की चरमराहट की आवाज एक ही रिदम में आ रही थी। बड़े बरगद के पेड़ से आगे निकलते ही बैताल  उसके कंधे पर सवार हो गया,आज बैताल  के कंधे पर पर एक गिरगिट सवार था। आगे बढ़ने पर अचानक सिंह की दहाड़ सुनाई दी, विक्रम निर्भीक चला जा रहा था। आगे भेड़िये इधर से उधर भाग रहे थे। थोड़ा आगे चलने पर आदमियों की पद चाप सुनाई देने लगी। विक्रम सतर्क हो गया। उनके पास पहुँचने पर गिरगिट कूदकर एक आदमी के सिर पर सवार हो गया।

बैताल  बोला “विक्रम तुम सिंह की गर्जना सुनकर भी विचलित नहीं हुए,भेड़ियों को देखकर भी उन्हें नजर अंदाज कर दिया फिर आदमियों को देखकर सतर्क क्यों हुए, जानते हुए भी मेरे सवाल का जवाब नहीं दोगे, तो तुम्हारे सिर के टुकड़े- टुकड़े कर दूँगा।”

विक्रम बोला, ” जो आदमी ने चारा डाला था, सिंह उसका शिकार कर आराम से  खा रहा था,आवाज़ें सुन उसने दहाड़ लगाई, भेड़िए शेर के बचे शिकार की घात लगाए डोल रहे थे। आदमी सिंह के शिकार की फिराक में थे।”

बैताल  ने टोका “फिर तुम इन्सानों को देखकर सतर्क क्यों हुए?”

विक्रम बोला, “देखा नहीं था गिरगिट कैसे उसके सिर पर सवार हो गया था, आज आदमी उसका वंशज हो गया है,इंसान कहाँ रहा। अब न जाने वह कब रंग बदल लेगा।”

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3-फादर्स डे

स्कूल में बेटे के दाखिले का फार्म भरते हुए प्राचार्य ने पूछा,”जी, बच्चे के पिता का नाम?”

“क्यों, क्या जरूरत है पिता के नाम की?”

व्यंग्य से, “तो मालूम नहीं है?”

“मालूम क्यों नहीं है, माँ को ही बच्चे के बाप का नाम मालूम होता है।”

“तो फिर लिखवाएँ, या पक्का नहीं है।”

“आपकी मानसिकता आप के सवालों में दिख रही है।”

सकपकाते हुए, “जी नहीं, मुझे कोई मतलब नहीं। आप सिर्फ इसके पिता का नाम लिखवाइए।”

“क्यों लिखाएँ? आप मेरा नाम लिखिए।”

“आपका नाम माँ के कॉलम में आ गया, पिता के नाम का भी कॉलम है।”

“जो जिम्मेदारी नहीं उठा सकता, उसका नाम क्यों?”

“रिश्ते में पिता का नाम लिखना जरूरी है, तो नॉट नोन लिख दूँ।”

तैश में, ” नॉट ट नोन क्यों लिखोगे, वायलॉजिकल बाप ही, बाप नहीं होता। आप दोनों कालम में मेरा ही नाम लिख लीजिए।

“जी अच्छा।”

“उत्तरदायित्व उठाने वाला ही बाप होता है मुझे गर्व है मैं ही इसकी माँ हूँ मैं ही बाप।”

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4-मन के काँटे

“गीता बाई यह दोनों गद्दे अपने घर ले जाना, बेड पर आर्थोपेडिक मैट्रेस डलवा दिए हैं।”

“अब का करेंगे मेम साब इन गद्दों का?”

“क्यों क्या हुआ?”

“मेम साब जब मैं शादी होकर आई थी तब सोचती थी ऐसे गद्दे मिलेंगे, पर ना बाप ने दिए न यहाँ पर मिले। शादी के थोड़े दिनों के बाद ही सास ने आपका घर पकड़ा दिया। तब मैं झाड़ू लगाते -लगाते कभी- कभार आपके पलंग पर बैठ जाती थी। सच्ची बता रही, आप नाराज नहीं होना। चादर बदलने के पहले, एक बार मैं आपके पलंग पर लेट भी गई थी, वह मखमली छुअन और गुदगुदाहट अभी तक याद है। तब आपकी शादी को भी तो तीन माह ही हुए थे।” 

“अच्छा तूंने बताया नहीं कभी, चल कोई बात नहीं।”

“सपने में दिखते थे आपके यह गद्दे, पर हमारी किस्मत में तो गोदड़ी ही लिखी थी।”

“चल अब बदल ले अपनी किस्मत, ले जा यह गद्दे।”

“अब क्या किस्मत बदलेगी मेम साब?” “सालों से आपसे बतिया रहें हैं, मैं तो चोटों – घावों को दिखाकर रो- बिलख लेती पर आप तो कुछ दिखा भी नहीं पाती, मुझे अब सब समझ में आ गया है।”

“क्या समझ में आ गया है?”

“इन गद्दों में भी काँटे हैं हमारी गोदड़ी की तरह।”

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5-फाउंटेन पेन 

उस जमाने में बी. ए. प्रथम श्रेणी से पास होने पर बाबू जी को कालेज के प्राचार्य ने पारितोषिक स्वरूप दिया था यह पेन। बाबू जी ने न जाने कितनी कहानियाँ, कविताएँ लिखी। हमेशा उनकी सामने की जेब में ऐसे शोभा बढ़ाये रखता जैसे कोई तमगा लगा हो।

मेरी पहली कहानी प्रकाशित होने पर बाबू जी ने प्रसन्न होकर मेरी जेब में ऐसे लगाया जैसे कोई मेडल लगा रहे हों।

आज बाबू जी की पुण्य तिथि पर उनकी तस्वीर पर माला चढाकर, पेन साफकर, स्याही भरके शर्ट के सामने की जेब में खोंसकर एक सिपाही की तरह सीना तान कर कार्यालय पहुँचा।

लिखने के लिए एक दो बार पेन निकाला, पर हाथ काँप गए, कुछ न लिख सका।

न जाने क्यों आज बाबू जी की हिदायत बार- बार मेरे कानों में गूँज रही थी:”बेटा इस पेन से कभी झूठ नहीं लिखना,

और न ऐसा सच जिससे किसी का अहित हो।”

मैं कचहरी का बड़ा बाबू दिन भर उस पेन को जेब में खोंसे रहा। घर आकर पिता जी की फोटो के साथ टिका दिया,उनके नाम का दीपक जलाकर।

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6-चैम्पियन

दौड़ शुरू ही होने वाली थी तभी सरिता की एक सहेली ने आकर पूछा :”सरिता क्या तेरी टांग में चोट लगी है?”

“नहीं तो।”

“घुटने के पास दबाते हुए इधर, इधर देख तुझे दर्द नहीं हो रहा।”

“नहीं हो रहा।”

“जरूर कुछ गड़बड़ है, तुम्हें दर्द भी महसूस नहीं हो रहा है।”

“नहीं तो।”

“क्या नहीं तो, नहीं तो,लगा रखी है,यह घुटने के नीचे देख नीला- सा पड़ गया है, पाँव चलाकर देख।”

“ठीक तो है।”

तभी दूसरी सहेली ने  पूछा, “क्या हो गया सरिता?”

“कुछ भी तो नहीं।”

“तू  ग्राउण्ड पर कुछ लँगड़ा -सी रही थी, मैं तो तुरंत बोलने वाली थी।”

“नहीं मुझे कुछ नहीं हुआ है।”

“अच्छा खड़े होकर देख, थोड़ा वजन डाल इस दाहिने पैर पर।”

“हाँ! कुछ तो है, पर मुझे पता ही नहीं चला।”

“तू बिल्कुल सीरियस नहीं है,अपने शरीर के प्रति,बस एक ही धुन।”

सब देख-सुन रही तीसरी सहेली भी आ पहुँची “यह क्या भीड़ लगा रखी है,क्या हुआ हमारी चैम्पियन को?”

“घुटने में कुछ समस्या है, लगता है चोट लगी है।”

“अरे, सरिता, थोड़ा दौड़कर तो दिखा।”

सरिता उठी – “आह ,कुछ दर्द -सा तो हो रहा है।”

प्रतियोगिता प्रारंभ होने की सीटी बजी,

“आह! आउच! मैं नहीं दौड़ पाऊँगी,

लगता है इस साल भाग नहीं ले पाऊँगी।” 

सरिता की तीनों सहेलियों की नजरें  एक दूसरे से मिलीं और कुटिल मुस्कान समेटती हुई खुश होकर जा रही उसे अकेला छोड़कर।

सीटी की आवाज उसके कानों में गूँजी, वह यकायक उठी और जर्सी उतार फेंक ट्रैक की ओर दौड़ पड़ी। मन ही मन बुदबुदाती जा रही,”नहीं, मैं कमजोर नहीं हो सकती, मैं ही चैम्पियन हूँ और रहूँगी।”

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7-एक टोकरी सब्जी 

पति से लड़ -झगड़कर,फिर तर्क- वितर्क से समझा- बुझाकर उसने निर्णय कर ही लिया कि सब्जी बेचने वह खुद ही शहर जाएगी।

शाम को ही सब्जियाँ तोड़कर टोकरी तैयार कर ली थी। सुबह जल्दी से घर का काम निपटाकर आठ बजे की पेसेंजर पकड़ ली।

टोकरी से झाँकती ककड़ी को निकालते हुए रेलवे पुलिस के सिपाही ने पूछा- “यह किसकी टोकरी है?”

सिर ऊपर कर मरी आवाज में बोली “मेरी है।”

नजरों के वार को झेलते हुए गाड़ी की खड़र-बड़र में विचारों के झोकों संग आगे बढ़ चली  ।

फुटपाथ पर टोकरी रखकर बैठने लगी कि पीछे से आवाज गूंजी,”ए बाई!  इधर कहाँ बैठ रही मेरी दुकान के सामने?”

“दुकान से इतनी दूर सड़क पर तो बैठे है भइया।”

“सामने से थोड़ा एक तरफ हठ जाओ।”

इसमे ही भलाई समझ थोड़ा बाजू में खिसक गई।

“क्या लाई हो दिखाओ तो जरा?” नई सूरत और ताजी सब्जी देख दुकानदार नरम पड़ा।

सवा किलो ककड़ी को एक किलो तुलवाकर, अभी देते है का आश्वासन देकर अपनी दुकान जमाने में लग गया।

एक अधेड़ आकर नजरों से उसका जायजा लेने लगा और एक ककड़ी उठाकर मुँह में डालते हुए- ” ककड़ी क्या भाव, ताजी है …,नई आई हो…! ” प्रश्नों को उछाल दिया।

“ये लो बाई बैठकी की रसीद।” 

नगरपालिका कर्मचारी ने रसीद बढ़ाते हुए कहा।

“बैठते ही जा रहे भइया, अभी बोहनी  तक नहीं हुई।”

नई बहिन को देखकर उसने भी नरमी दिखाई, “थैली में आधा किलो ककड़ी डाल दे, अभी आते हैं, तब तक फुटकर रखना।”

अपनी टोकरी की सब्जियाँ  सजाते हुए सोच रही सुबह से ढाई किलो ककड़ी निकल गई एक पैसा नहीं मिला।

ग्राहकों के मोल भाव, जुमले और नसीहतें सुनते – सुनते टोकरी खाली होने लगी।

दिनभर की धूप से सब्जियों को तो बचाए रही पर शाम होते- होते खुद ही कुम्हलाने लगी,  लिजलिजी छुअन और टटोलती नजरों की जलन से।

पेट में दो समोसे डालकर सपनों की डोर पकड़े  वापसी को शाम की गाड़ी में सवार हो गई। 

 टी वी पर सुनी वह बातें अभी भी उसके कानों में गूंज रहीं “किसानों को सीधे खरीदार से जुडना चाहिए, किसानों को लागत मूल्य का दो गुना मिलना चाहिए, छोटे किसानों से मोलभाव नही करना चाहिए…।”

घर पहुँच कर नीची नजरों से, सब्जियों की बिक्री से मिले चंद रुपये पति के हाथ पर रख दिये, पर सब्जियों के साथ और क्या बेमोल बिक गया बता न सकी।

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