हिन्दी–लघुकथा लगभग एक सौ चालीस वर्ष की यात्रा करते–करते आज इस पड़ाव पर आ पहुँची है ,जहाँ उसकी गहन पड़ताल अनिवार्य हो गई है ताकि लघुकथा एवं इसके पाठक यह जान सकें कि लघुकथा एवं उसके सृजक कहाँ तक पहुँच पाये हैं ?
इस दिशा में यों तो ‘तत्पश्चात्’ एवं ‘कथादेश’ जैसे प्रशंसनीय कुछ प्रयास हुए, किन्तु इस कार्य को विराटता एवं भव्यता के साथ प्रस्तुत करने का जोखिम उठाया चर्चित कथाकार मधुदीप ने और ‘पड़ताल और पड़ताल’ शीर्षक से पन्द्रह खंड प्रकाशित कर दिये,जिनमें से अधिकतर का सम्पादन–कार्य स्वयं उन्होंने ही किया है।
समीक्षार्थ मेरे समक्ष तेरहवाँ खंड है, जिसमें क्रमश: अंजना अनिल, चैतन्य त्रिवेदी, नीता श्रीवास्तव, प्रताप सिंह सोढ़ी, मुकेश शर्मा और रामयतन यादव की ग्यारह–ग्यारह लघुकथाओं को चयनित किया गया है। इनपर लिखने वालों में क्रमश: डॉ कमल चोपड़ा, डॉ अशोक भाटिया, डॉ शील कौशिक, डॉ पुरुषोत्तम दुबे, डॉ योगेन्द्र शुक्ल एवं डॉ शिवनारायण के लेख हैं और इन सभी रचनाकारों की लघुकथाओं पर समेकित विस्तृत लेख ख्यातिलब्ध लघुकथाकार डॉ सतीश दुबे ने लिखा है और अन्त में धरोहर के रूप में डॉ शंकर पुणतांबेकर की ग्यारह लघुकथाएँ हैं ।
अंजना अनिल की सभी ग्यारह लघुकथाएँ प्राय: पत्र–पत्रिकाओं एवं संकलनों में प्रकाशित हैं। इनकी लघुकथाओं की विशेषता उनकी सहजता और सरलता है, जिसे विषय एवं भाषा के स्तर पर देखा जा सकता है। इन्होंने कोई भी प्रयोग करने का कोई जोखिम नहीं उठाया, यही कारण है इनकी प्राय: लघुकथाएँ बनी–बनाई लीक पर चलते हुए अपने लक्ष्य तक पहुँचती हैं और पाठकों तक बड़ी सहजता से संप्रेषित भी हो जाती हैं।
मेरी ऐसी मान्यता है कि लेखक को विषय एवं शिल्प के स्तर पर अपने वर्तमान के अनुसार चलना चाहिए । तात्पर्य यह है कि हमारी वर्तमान समस्याएँ एवं विडंबनाएँ क्या हैं ? इस पर भी लेखक का यान अवश्य जाना चाहिए । इसी के साथ–साथ विषय के अनुसार ही उसका शिल्प भी होना चाहिए और विधा को विकास देने की दृष्टि से विधा के अनुशासन भंग न करते हुए कुछ सार्थक प्रयोग भी करने चाहिए ताकि विधा आगे बढ़ती चले । इस दिशा में अंजना निराश करती हैं किंतु यहाँ जो ग्यारह लघुकथाएँ प्रस्तुत हैं वे निस्संदेह अंजना की प्रतिनिधि् लघुकथाएँ हैं, इससे इंकार नहीं किया जा सकता ।
चैतन्य त्रिवेदी अंजना अनिल की लघुकथाओं के विषय एवं शिल्प की दृष्टि से आगे निकल गये हैं, इन्होंने अपने समय को देखा–परखा है और कहीं–कहीं लघुकथा के अनुशासन में रहकर हल्के–फुल्के प्रयोग भी किये हैं जिससे लघुकथा को लाभ हो सकता है । ऐसी लघुकथाओं में ‘मुकद्दर के साथ’, ‘जंगली और जंगल’, धर्म पुस्तक’ आदि लघुकथाओं का अवलोकन किया जहा सकता है। विषय के अनुसार उनकी भाषा प्राय: कदम से कदम मिलाकर चलती है, जिससे इनकी लघुकथाओं का सौंदर्य बढ़ जाता है।
नीता श्रीवास्तव कहानीकार के रूप में जानी जाती हैं, किन्तु वे पांक्तेय श्रेणी में नहीं आतीं । लघुकथा–जगत् में भी इनकी पहचान लघुकथाकार के रूप में अब तक नहीं बनी; किन्तु यहाँ प्रस्तुत इनकी ग्यारह लघुकथाएँ यह सोचने को विवश करती हैं कि अब तक ऐसा इनके साथ क्यों हुआ ? इसका कारण संभवत: यह हो सकता है कि इन्होंने नारी–जीवन एवं घर–द्वार के अतिरिक्त बाहर झाँकने की कोशिश बहुत कम ही है। आज के दौर में लेखक चाहे स्त्री हो या पुरुष उसे अपने समय को जीना एवं भोगना होगा, इसके अतिरिक्त इसके साथ जूझना भी होगा और तब उस यथार्थ को अनुकूल शिल्प में प्रस्तुत करना होगा । तभी अपने समय में आपकी पहचान बन सकती है। यों खैर कर रब्बा, नशा, गूँगे–बहरे इत्यादि लघुकथाएँ ऐसी हैं जिनकी मुख्य–धारा में चर्चा होनी चाहिए ।
प्रताप सिंह सोढ़ी एक सुपरिचित लघुकथाकार हैं ।इनकी अनेक रचनाएँ लघुकथा–जगत् में जानी–पहचानी जाती हैं। इनकी प्राय: रचनाएँ पत्र–पत्रिकाओं एवं संकलनों में संकलित हो चुकी हैं। दर्द के रिश्ते, दंगा–फसाद, जूते इत्यादि सोढ़ी की पहचान है। इसका कारण इनकी सरस एवं सटीक भाषा–शैली है। इसके अतिरिक्त इनकी विषय–वस्तु अपने समय का सही प्रतिनिध्त्वि भी करती है, जो बहुत सहजता से पाठकों के हृदय में अपना स्थान बना लेती है।
मुकेश शर्मा पिछली सदी के अंतिम दशक से लघुकथा–जगत् में सक्रिय रहे हैं, किन्तु बीच में काफी समय तक सक्रिय तो नहीं ;किन्तु कुछ–न–कुछ करते रहते हैं। इन्होंने बहुत अधिक लघुकथाएँ तो नहीं लिखीं किन्तु ; जो लिखीं उनमें से कुछ तो ऐसी अवश्य हैं जिन्होंने इन्हें अपनी अलग पहचान दी है। इनकी चर्चित लघुकथाओं में अस्तित्व की तलाश, कटी हुई पतंगें, बर्फ़ पर पड़ी संवेदना इत्यादि मुख्य हैं। मुकेश और अच्छा लिख सकते हैं ,अगर ये संवादों में भाषण–शैली का निषेध करें । इससे अनावश्यक विस्तार हो जाने से लघुकथा अपनी स्वाभाविक धार खो बैठती है। इन्हें पारंपरिक शिल्पों का मोह छोड़कर कुछ नया भी करना चाहिए । जिससे लघुकथा के विकास में इनका योगदान माना जा सके ।
रामयतन यादव यों तो बीती सदी के अंतिम दशक से इस विधा में चल रहे हैं किन्तु इनकी प्राय: लघुकथाएँ कहीं खलील जिब्रान, तो कहीं सुकेश साहनी तो कहीं युगल की लघुकथाओं से इस हद तक प्रभावित हैं जैसे लगता है ये रचनाएँ उन्हीं की प्रतिलिपि हैं। यह रचनाकार की सबसे बड़ी कमज़ोरी और यह लेखकीय धर्म के विरुद्ध भी है। लेखक को सदैव अपना मार्ग अपने बलबूते एवं अपने सोच पर प्रशस्त करना चाहिए। ‘चोरी’ रचना सुकेश की रचना से पूरी तरह प्रभावित है।
मूल्यांकनकर्त्ताओं ने काफी उदारता एवं उदात्तता से काम लिया है । किसी–किसी ने तो ऐसा लगता है जैसे मैत्री धर्म का निर्वाह करते हुए रचनाओं के कमज़ोर पक्ष पर दृष्टि डालने या उसे प्रत्यक्ष करने की आवश्यकता ही नहीं समझी । यह आलोचना–कर्म के प्रति ईमानदारी नहीं है। जबकि तटस्थ होकर लिखा जाता तो लेखकों को अपनी कमियों का भी एहसास होता और भविष्य में वे अपेक्षाकृत और अधिक श्रेष्ठ रचनाएँ दे सकते थे । वस्तुत: ‘पड़ाव और पड़ताल’ का यही उद्देश्य भी है जो इस खंड में उस स्तर तक पूरा हो नहीं पाया ,जिस स्तर तक मधुदीप इसे ले जाने हेतु प्रयासरत हैं। फिर भी इस खंड के महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता, जिसमें अनेक–अनेक श्रेष्ठ लघुकथाएँ पढ़ने को एक–साथ मिल जाती हैं और रचनाओं की कमियाँ न सही, कुछ विशेषताएँ तो पढ़ने को मिल जाती हैं।
कुल मिलाकर मधुदीप की इस विशाल एवं अब तक की सबसे बड़ी कार्य–योजना की सफलता यह स्पष्ट करती है कि शृंखला के भावी खंड और अधिक सफलता के शिखरों का स्पर्श करेंगे ।
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जून 2026
दस्तावेज़लघुकथाओं की उदारतापूर्वक पड़ताल करता तेरहवाँ खण्ड Posted: December 1, 2015
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