जून 2026

भाषान्तरबुलावा/ न्यूतू     Posted: May 1, 2023

गढ़वाली अनुवाद :डॉ. कविता भट्ट ‘शैलपुत्री’

  ठक-ठक….!

ठक-ठक….!

“को च ? द्वार खुल्ला छन ऐ जावा।”

 “राम राम चन्दा!”

“राम राम बाबूजी! तुम इख!”

 “किलै, मि इख नि ऐ सकदौं क्या?”

“ऐ किलै नि सकदाँ! पर इख औंदू इ को च!”

“अयों न आज! ये कार्ड देणू म्यारा नौना  का ब्यो कु कार्ड च !

 “कार्ड ! नौंना का ब्यो कु !”

 “हाँ अगला मैंना महीने म्यारा नौंना कु ब्यों च तुम सब्बी आन।” 

 “……!”

“…अर या मिठै सब्बु मुख मिट्ठू कन्ना वास्ता !”

कौंपदा हात्थु न मिठै कु डिब्बा पकड़िक चंदा न बोली

“हम त जबरदस्ती पौंछी जाँदाँ ब्यो काज या सुलकुडू हूँण पर, त लोग मुक बणै दींदन अर तुम हमतैं न्यूतु दीक…!”

 अगनै का शब्द चंदा का गौला माँ इ अटगि गेन ।

 “चन्दा, बरसु बिटी तुम तैं दिखणु छौं सब्बू तैं सुभकामना बाँटदु !”

“…..!”

“…..!”

 “याद च जबरि म्यारू नौनु ह्वै छौ त पूरु खोल़ा मुंड म उठै यली छौ तिन खुसी म।”

 “हाँ! अर तुमुन खुसी खुसी हमारू मनपसंद सगुन बि दे छौ !”

 “तुम लोखु की सुभकामना सि म्यारु नौनु पढी लेखिक डॉक्टर बणी गै… अर तुम सब्बू न वे का ब्यो माँ जरूर औण !”

“किलै नि आँण जरूर औला बाबूजी! जरूर औला ! तुमुन इतगा इज्ज़त मान सी बुलाई, त किलै नि औण!”

बुल्दी बुल्दू चंदा की आँखी गंगा- जमुना-सी बगण लगी गेन अर वींकु मुंड बाबूजी क अगनै झुकी  गै।

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