मेरे पुराने रिजेक्टेड सोफे को देखने के बाद कबाड़े वाले ने पूछा- ‘‘कितने तक देंगे साहब।’’
‘‘पाँच सौ रुपये तो लग गए हैं इसके।’’
चेहरे पर फैली पसीने की बूँदों को अपनी मैली कमीज की आस्तीन से पोंछते हुए वह बोला, ‘‘पाँच सौ रुपये तो मेरी हैसियत नहीं है साहब।’’
मैंने पूछा ‘‘तुम लोग तो कबाड़े का सामान अपने सेठ को ले जाकर देते हो।’’
‘‘लेकिन यह सोफा, तो साहब मैं अपने लिए खरीदना चाहता हूँ।’’
‘‘तुम्हारे घर में इसके रखने की जगह है’’- मैंने सवाल किया।
उत्तर में वह बोला, ‘‘नहीं साहब एक खोली में रहता हूँ, इसे ठीक करवाकर, अपनी लड़की की शादी में उसे दूँगा।’’
उसने दो सौ रुपये मेरी तरफ बढ़ाए।
मैं कभी उन रुपयों को, कभी अपने पुराने सोफे को देख रहा था। मेरे संवेदन तंतुओं को दया एवं सहानुभूति की तरंगें झंकृत कर रही थी। मैंने अपना निर्णय सुनाया -‘‘मेरी तरफ से बिटिया की शादी में इस उपहार में दे देना।’’
नम हो गई आँखों को अपने तहमद से पोंछते हुए वह बोला, ‘‘मुझ गरीब की मुराद पूरी कर जो एहसान आपने मुझे पर किया है, उसे मैं ताउम्र नहीं भूलूँगा। अपनी कमाई से ही उसे यह सोफा दूँगा।’’
मैं कुछ कहता, इसेक पहले ही उसने सोफे को ठेले पर रखा और चल दिया।
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