‘‘भाई साहब! अब मैं अपनी जिन्दगी के बारे में आपको क्या बताऊँ चालीस साल पहले जब मैं गाँव से इस शहर में आया तो बिल्कुल खाली हाथ था। न किसी से जान-पहचान और न सिर छिपाने का कोई ठिकाना। बड़ी मुश्किल से फतेहपुरी की धर्मशाला में दो दिन को छत मिली थी। मैं भी पक्का निश्चय करके आया था कि इस शहर से खाली हाथ कतई नहीं लौटना है, सो अगले दिन ही नया बाजार जा पहुँचा और जुट गया पल्लेदारी में। कमर पर बोरियाँ ढोई हैं मैंने और आज मेरे पास सब-कुछ है। नया बाजार में अपनी दुकान है और मॉडल टाउन में अपनी कोठी।’’
‘‘बात तो तुम्हारी ठीक है दोस्त! मगर अब भी तुम्हारी जिन्दगी में ठहराव क्यों नहीं है? तुम इतना उखडे हुए क्यों लग रहे हो?’’
‘‘नहीं तो….’’
‘‘देखो, जो कुछ तुम जुबान से कह रहे हो, तुम्हारी आँखें उसके खिलाफ बहुत-कुछ बयान कर रही हैं।’’
‘‘हाँ भाई साहब! तुमने मेरी चोरी पकड़ ली है। अब मैं तुमसे झूठ नहीं कह पाऊँगा। यह सच है कि आज मेरे पास सब कुछ है मगर यह उससे भी बड़ा सच है कि आज मेरा अपना कोई भी नहीं है।’’
‘‘तुम्हारा भरा-पूरा परिवार है!’’
‘‘यह सच है, मगर यह भी झूठ नहीं है कि मेरा अपना कोई भी नहीं है।’’
‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’
‘‘मैं सबके लिए सब-कुछ जुटाने के चक्कर में इस कदर उलझा रहा कि मुझे पता नहीं चला कि कब सब मुझसे दूर चले गए। खैर छोड़ो, तुम नहीं समझोगे!’’
‘‘नहीं दोस्त, मैं तुम्हारे बारे में बहुत पहले से ही सब-कुछ समझता हूँ, जानता हूँ। तुम भूल रहे हो, मैंने तुम्हें इस अन्धी दौड़ में दौड़ते हुए कई बार टोका है, मगर तुम दौड़ते हुए इतना आगे निकल गए थे कि मेरी आवाज तुम तक पहुँच ही नहीं सकी। आज तुम दौड़ते हुए थक गए हो इसलिए पकड़ में आ गए।’’
‘‘मैं नहीं जानता, इस दौड़ का अन्त कहाँ होगा।’’
‘‘मगर मैं जानता हूँ।’’
‘‘तो बताओ ना!’’
‘‘दौड़ना तो तुम्हें होगा ही मेरे दोस्त! मगर अब इस दौड़ की दिशा बदल दो।’’
‘‘क्या मतलब?’’
‘‘अब तक तुम अपने और सपनों के लिए दौड़ते रहे हो, अब से तुम दूसरों के लिए दौड़ो। देखना, तुम्हारे चारों तरफ फैला अकेलापन कैसे जादू की तरह गायब होता है।’’
मैं सिर उठाकर सामने देखता हूँ, मगर सामने की कुर्सी पर तो कोई भी मौजूद नहीं है।
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