‘आशा! तेरा कस्टमर आया है।’
‘बिटिया! तू यहीं बैठ, मैं अभी आई काम करके।’
‘जल्दी आना। ‘
थोड़ी देर बाद फिर आवाज –‘आशा! नीचे आ जल्दी।’
‘बिटिया! तू थोड़ी देर खेल ले, मैं बस अभी आई।’
‘हूँ —।’
‘बिटिया! तू खाना खा ले, तब तक मैं नीचे जाकर आती हूँ।’
‘अच्छा’– उसने सिर हिला दिया।
दिन भर में आशा को संबोधित करती ऐसी ही आवाज ना जाने कितनी बार आती और आशा सात – आठ साल की बिटिया को बहलाकर नीचे चली जाती।
ऐसा ही एक पल –‘बिटिया! ध्यान से पढ़ाई करती रहना, मैं बस अभी आई काम करके।’
‘अम्माँ! अकेले कितना काम करोगी? थक जाओगी तुम, रुको ना, मैं भी चलती हूँ तेरे साथ। तुम कहती हो ना, कि मैं बड़ी हो गई हूँ?’
आशा लड़खड़ाकर सीढ़ी पर बैठ गई।
-0-डॉ. ऋचा शर्मा, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001