जून 2026

देशसँकरी गली     Posted: October 1, 2023

-सुनो। आओ धूप में बैठें।

 -चलो। कुर्सियाँ लगा दी हैं। आओ।

– आ गई। आज कुछ यादें आ रही हैं।

-कैसी?

– शादी की और शादी के बाद की।

-कैसी यादें?

-वो जब मेरी डोली उतरी थी और वो रास्ता, वो गली कितनी तंग थी।

-हाँ। वह गली बहुत मशहूर थी सारे शहर में भीड़ी गली के नाम से।

-आज सोचती हूँ कि वह गली हमारी शादी जैसी रही होगी।

-कैसे?

-किसी अनजान शख्स से शादी, जीवन की शुरुआत किसी ऐसी गली जैसी, जिसका कुछ अता-पता न हो कि क्या होगा आगे?

-हाँ! यह तो है कि आगे क्या हुआ फिर बताओ ?

– वैसे तो सबकुछ ठीक रहा, पर आपकी फितरत न बदली।

-कौन-सी?

-दूसरी महिलाओं के पीछे भागने की ।

-अरे! ऐसा कहाँ और कब हुआ ?

-आज तो सच मान लो कि आप कभी किसी, तो कभी किसी के पीछे दीवाने होने में देर नहीं लगाते थे ।

– नहीं यार। ऐसा कुछ नहीं था।

– तो क्या था?

– क्या कहूँ उस फितरत को? थी वह?

– बस। कुछ बात पसंद आ जाती थी। इतनी ही ।

– बस। इतनी ही?

-तो और क्या?

-यदि मुझे भी किसी पर-पुरुष की इतनी-सी बात पसंद आ जाती, तो बच्चों का क्या होता?

– अरे आप ऐसा कर ही नहीं सकती थीं।

-क्यों? सारी पावनता का ठेका मैंने ही ले रखा था? आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं थी?

-छोड़ो यार। धूप का मज़ा लो न। अब तो हम पुरानी बातें छोड़ें।

-मैं तो आपको पकड़ ही न सकी। बस, भागते ही रहे इधर से उधर। संकरी गली में। क्यों?

-छोड़ो न।

-तभी तो जिंदगी यहाँ तक आई कि मैं छोड़ती ही गई और इतने में बच्चे हो गए। मेरी जिम्मेदारी पूरी हो गई।

-मैंने भी तो जिम्मेदारी निभाई ।

-ऐसे निभाते हैं?

बड़ी तीखी नज़र से पूछा तो वह कोई जवाब न दे पाया।

धूप अब एकदम बहुत चुभने लगी थी।

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