“बड़ी देर कर दी।” बाइक खड़ी करते हुए पति से वह बोली।
“अरे! झोला गिर गया था। उफ़ ..ओ! बड़ी मुश्किल से मिल पाया।”- लंबी उबासी लेते हुए पति बोला।
“कैसे गिरा?”
“सामान ज़्यादा हो गया था, पीछे बाँध लिया, बहुत आगे निकल आया, तब पीछे बँधे झोले पर ध्यान गया। फ़ौरन गाड़ी मोड़ी, ख़ैर मिल गया, ऊपर वाले की दुआ से। वर्ना हज़ारों की टॉप बैठ जाती।”
“किस भले मानुष ने वापस किया।”
“एक रंडी ने, रेड लाइट एरिया के पास वहीं खड़ी एक रंडी के हाथ लग गया। वापस लौटा, तो वह बेचारी झोला लिये खड़ी थी बोली, “भैया, मैंने गिरते देख लिया था, पर तुम इतनी स्पीड में थे कि निकल ही गए।”
पत्नी मुँह बिसूरते हुए तैश में बोली- “एक भला इंसान भी कह सकते हो, पढ़े लिखे हो, बिलकुल असभ्यों की तरह …।” असभ्य…….असभ्यऽऽऽ……. जैसे कनपटी पर किसी ने तमाचा जड़ दिया हो। चेहरा स्याह पड़ गया। निःशब्द पति झोला पकड़े अंदर बढ़ रहा था। अब वह रंडी शब्द उसके मनोमस्तिष्क में सैकड़ों सुइयों की तरह चुभ रहा था। पीड़ा का पहाड़ सिर पर बढ़ता जा रहा था।
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