मिन्नी का रुदन देख सबके कलेजे मुँह को आ रहे थे। कभी उसकी चीत्कार दिल दहला देती तो कभी वह पत्थर की शिला बन अपलक पति की पार्थिव देह को घूरती रहती। पहाड़ सी ज़िंदगी कैसे काटेगी वह ! उसकी बिलखती माँ के बोल सुन वहाँ सबकी आँखों से आँसू झरने लगे। हाय रब्बा मेरे प्राण ले ले पर मेरे पुत्तर को खड़ा कर दे। कैसे जिएगी मेरी बच्ची अभी उसकी उम्र ही क्या है ? अभी उसने देखा ही क्या है ? दो छोटे-छोटे बच्चे अकेली कैसे पालेगी? माँ के विलाप में बेटी के अंधकारमय हो चुके भविष्य की चिंता थी। बाकी सब लोग इस औचक जवान मौत पर हैरान थे। पैंतीस वर्ष की उम्र भी कोई हार्ट अटैक से मरने की उम्र होती है भला?
महेश की माँ भी मानो पत्थर हो चुकी थी। एक ही तो बेटा था उसका बेटियाँ तो बड़ी थी। कब की अपने घर की हो चुकी थी। बार-बार पूछती कल रात तो महेश ने मुझसे वीडियो कॉल पर बात की थी फिर ये अचानक क्या हुआ, कैसे हुआ? मिन्नी की ननदों के शोक में आरोप अधिक थे। हमारा भाई अकेला हॉस्पिटल क्यों गया, उसे क्या इंजेक्शन दिया गया आदि-आदि। पड़ोसियों ने मृतक की बहनों को विस्तार से पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी, मगर वे तो एक ही बात साबित करने पर तुली हुई थी – भाभी हमारे भाई को खा गई। मृतक की माँ भी अपने बुढ़ापे की लाठी छिनने का पूरा दोष मिन्नी के माथे फोड़ रही थी। बहू की तरफ़ नफ़रत से देखते हुए बोली, “बेटा गया तो हमारा गया, किसी का क्या गया?”
तभी दो नन्हे हाथों ने उसकी तरफ़ पानी का गिलास बढ़ाते हुए कहा, “दादी रोओ मत।”
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