हाल-फिलहाल लघुकथा के संदर्भ में दो विरोधाभासी पक्ष उजागर होते हैं, जो कि एक अरसा -भर सामानांतर चलने के बाद अब टकराने भी लगे हैं। तिस पर यह टकराहट सिर्फ लेखक और लेखक की नहीं, लेखक और पाठक की भी है।
पहला पक्ष है कि लघुकथा में असीम ऊर्जा और संभावनाएँ हैं कि यह वक्त की माँग है और इसे विधा के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।
दूसरा पक्ष है कि लघुकथा चुटकुलेबाजी है कि अधिकतर लघुकथाकार स्वयं इसे गंभीरता से नहीं ले रहे, फिर कोई दूसरा क्योंकर लेगा? कि यह छुटभैयों का खेल है, बस !
इन दोनों बातों के ठीक सामने है पाठक, जो निसंदेह लघुकथा में रुचि ले रहा है। इसलिए बहस के लिए बहस न कर कथा की संभावनाओं की खोजपरकता के लिए की जाए, तो कहना होगा कि दोनों पक्षों की दलीलों में दम तो है; मगर ‘खम’ नहीं, क्योंकि सैकड़ों लघुकथाओं के प्रकाशन के बावजूद जहाँ लघुकथाकार निरंतर बेहतर अथवा आदर्श रचनाधर्मिता का प्रमाण नहीं दे पाए, वहाँ उन रचनाकारों ने भी कोई ऐसा आदर्श प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं किया, जो कथाकार भी हैं तथा इसकी प्रभाव क्षमता को स्वीकार करते हैं।
इसका कारण है– लघुकथाकारों की जल्दबाजी, आपाधापी, जो प्रायः लघु पत्रिकाओं के माध्यम से परिलक्षित होती रहती है। अब तक विभिन्न लघु पत्रिकाओं के सौ से अधिक लघुकथा विशेषांक प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें से तारिका, मिनीयुग, समग्र, अंतर्यात्रा, लघुआघात, लहर, कथा बिंब आदि पत्रिकाओं ने लघुकथा के रचनात्मक पहुलओं को निखारा तथा रेखांकित भी किया है। कई समारोह तथा सम्मेलन भी हुए; लेकिन कुल जमा अधिकांश आवाजों की एक यही आवाज सुनाई देती है, “लघुकथा स्वतंत्र विधा है। इसे मान्यता प्रदान करो।” इस नारे के शोर में यह जानने-समझने की ज़रूरत नहीं समझी जा रही कि लघुकथा यदि विधा है, तो इसका प्रारूप क्या है तथा इसे मान्यता कौन देगा? इस मान्यता की आवश्यकता क्या है? क्या ऐसी या वैसी मान्यता के अभाव में लघुकथा नहीं लिखी जा सकती? ये कुछ बेलाग सवाल हैं, जिनके चलते अधिकतर लघुकथाकारों के माध्यम से लघुकथा एक तथाकथित आंदोलन की राह पर तो चल निकली; लेकिन विचार- प्वाह की दिशा हासिल नहीं कर पाई। जब डॉ. महाराज कृष्ण जैन को इसका कोई भविष्य नजर नहीं आया या कामतानाथ ने इसे चुटकुला कहा, तो कई लघुकथाकारों ने इस नजरिये को एक समीक्षक अथवा रचनाकार की चिंता के रूप में न लेकर विरोधी वक्तव्य के रूप में लिया और पत्थर उछालने शुरू कर दिए। ठीक वही हरकतें की गईं, जो कोई भी बेतरतीब भीड़ कर सकती है, जबकि ज़रूरत इस बात की थी कि इस विषय पर विस्तृत विचार-विमर्श किया जाता, जो नहीं हुआ और हम आज तक लघुकथा की परिभाषा की ही टाँग खींच रहे हैं। आज तक लघुकथा की जितनी भी परिभाषाएँ आई हैं, उनमें से एकाध को छोड़कर अगर उनकी शब्दावली में से ‘लघुकथा’ नाम हटाकर ‘कहानी’ रख दिया जाए, तो वह स्वयंमेव ‘कहानी’ के बारे में ही कही गई कोई बात लगेगी। ऐसा क्यों है और लघुकथा के शुभचिंतक इस कदर लाचार क्यों हैं कि कोई स्वतंत्र शब्दावली तक ईजाद नहीं कर पा रहे ? यह कोई लाचारी नहीं; बल्कि सचाई है, जिसे कोई भी छलावा छल नहीं पा रहा, क्योंकि गौरतलब होकर परखा जाए, तो लघुकथा की कोई भी तथ्यपरकता कहानी से अलग नजर नहीं आती। कहानी और लघुकथा, दोनों की मूलभूत माँग है-छोटापन यानी संक्षेप में अधिक कहे जाने का कौशल और ‘खत’ को ‘तार’ के रूप में प्रस्तुत करने का शिल्पगत नियोजन। कहानी और लघुकथा में अगर कोई अंतर है, तो वह है शब्द का अंतर । कहानी प्रायः हजार से पाँच हजार शब्दों का दस्तावेज़ होती है, तो लघुकथा सौ से हजार तक शब्दों का दस्तावेज़। मगर क्या ‘शब्द संख्या’ कोई ऐसी गुणवत्ता है, जो किसी चीज़ के चरित्र या विधान को बदल देती है? ऐसा न कभी हुआ है, न होगा। लघुकथा और कहानी की शब्द संख्या का अंतर ठीक वैसा ही है, जो किसी शिशु और युवा के कद में होता है। दूसरी तरफ किसी बात को कहने के लिए संक्षिप्तता को भी अपनी सीमा और संभावनाएँ होती हैं। लघुकथा हो या कहानी, किसी की भी खूबी यह होती है कि वह कितनी बात को बाकायदा और वांछित शब्दों में कह पाई है, इसी आधार पर इसकी सीमा तय होती है। यही वजह है कि कई बार कोई लघुकथा किसी कहानी का अंश प्रतीत होती है, तो कोई कहानी पढ़कर लगता है कि यह जरूरत से ज्यादा फैल गई है। यह बहुत सूक्ष्म अंतर है, जो रचनात्मक स्तर पर कथ्य को फलक प्रदान करता है, जिसे अधिकतर लघुकथाकार नहीं समझ पा रहे और महज ‘विधा विधा’ तथा ‘मान्यता मान्यता’ की गुहार मचाए हुए हैं। ये कभी नहीं सोचते कि लघुकथा के पितामह खलील जिब्रान ने क्या इसे विधा के रूप में मान्यता प्राप्त करवाने के लिए मुँह जोया था? खलील ने सिर्फ लेखन में विश्वास व्यक्त किया और आज सदियों बाद भी उनकी लघुकथाएँ मात्र ‘लघुकथा’ नहीं, बल्कि ‘रचना’ की श्रेणी में आती हैं और खाली-पीली मान्यता नहीं, प्रशंसा तथा सम्मान पाती हैं। वैसे भी लघुकथा की स्थिति अपने आप में सुदृढ़ है; क्योंकि रचना के स्तर पर इसे पाठकों की मान्यता बिला शक प्राप्त हो चुकी है। इसलिए हमारी पहली चिंता यही होनी चाहिए कि हम अपने आपमें ‘लघुकथा’ के माध्यम से ‘रचना’ की ओर अग्रसर हों, लघुकथा का औचित्य सिद्ध करें और लघुकथाकार को महत्त्वपूर्ण बनाने में होड़ नहीं करें।
नाम छूट सकते हैं, मगर फिर भी रावी, विष्णु प्रभाकर, रामनारायण उपाध्याय, रमाकांत, नरेन्द्र कोहली, अवधनारायण मुद्गल आदि वरिष्ठ रचनाकारों के बाद आठवें दशक से अपने नवीन रूप में प्रारंभ हुई लघुकथा की इस यात्रा में कमल गुप्त, रमेश उपाध्याय, असगर वजाहत, सुदीप, पृथ्वीराज अरोड़ा, कमल चोपड़ा, जगदीश कश्यप, प्रेम जनमेजय, सिमर सदोष, कृष्ण कमलेश, शंकर पुणतांबेकर, सतीश दुबे, कमलेश भारतीय, सुरेंद्र मंथन, सुरेंद्र सुकुमार, संजीव, मनीष राय, जगवीरसिंह वर्मा, भगीरथ, चंचल, राजकुमार गौतम, महावीर प्रसाद जैन, नरेंद्र मौर्य, प्रबोध गोविल, सच्चिदानंद धूमकेतु, नफीस आफरीदी, ऋषि प्रियदर्शी, कुलदीप जैन, अशोक भाटिया, विभांशु दिव्याल, सत्यपाल सक्सेना, विकेश निझावन, मधुकांत, कृष्ण शंकर भटनागर, भारत यायावर, जवाहर सिंह, प्रभु जोगी, विक्रम सोनी, ध्रुव जायसवाल, प्रचंड, सुभाष अखिल, गंभीर सिंह पालनी, भगवान प्रियभाषी, सुशील राजेश, मधुदीप, श्रीराम आयंगार, फूलचंद मानव, मोहन राजेश तथा सुरेश उनियाल, बलराम, महेश दर्पण, वीरेन्द्र जैन के अलावा महिला रचनाकारों में चित्रा मुद्गल, उर्मि कृष्ण, नीलम कुलश्रेष्ठ, निशा व्यास, शकुंतला किरण, शमीम शर्मा, अंजना अनिल आदि रचनाकार निरंतर लघुकथाएँ लिख रहे हैं या यदा-कदा लिखते रहते हैं। इन तमाम रचनाकारों की प्रतिनिधि रचनाएँ पढ़कर लघुकथा को परिभाषित किया जाए, तो कहा जा सकता है- ‘लघुकथा वह कला शिल्प है, जो किसी संवेदना को सूत्र रूप में पिरोकर उसे चिंतन और चिंता को बहुआयामी समझ प्रदान करने का प्रयास करता है, ठीक उसी प्रकार जैसे कहानी संवेदना के सूत्रों को खोलकर उन्हें बहुआयामी स्तर प्रदान कर जाती है।’
(‘सारिका’ 1-15 मार्च, 1984, लघुकथांक से साभार)