“दादा जी, आप तीन दिन पहले ही तो आये थे और आज गाँव वापस भी जाने लगे। आप हमेशा हमारे पास क्यों नहीं रहते?” गाँव वापस जाने की तैयारी करते दादाजी के सामने सोनू मचल गया था।
“बेटा, यहाँ पूरे दिन मुझे अकेले रहना पड़ता है… तेरे मम्मी-पापा दोनों दफ्तर चले जाते हैं, तू भी स्कूल चला जाता है… इसलिए मैं बोर हो जाता हूँ।”
“अकेले तो आप गाँव में भी रहते हैं। वहाँ भी तो चाचू अपने काम पर चले जाते हैं, चीनू भी स्कूल जाती है; चाची घर के काम में लगी रहती हैं, दादी जी भी अब नहीं रहीं। दिन में तो वहाँ भी आपसे बातें करने को कोई नहीं है…!”
“हाँ, ये बात तो बेटा बिल्कुल सही है। पर गाँव में चौपाल पर मेरा दिन खूब मजे से कटता है।”
“ये चौपाल क्या है, दादा जी?”
“चौपाल… चौपाल… गाँव वाले घर के बाहरी हिस्से में बना चबूतरा और बरामदा तो तुमने देखा ही है, वहाँ मेरे बहुत सारे अपनी उम्र के लोग, जो खाली होते हैं, आकर बैठते और गपशप करते हैं। कुछ लोग हमसे अपनी समस्याओं पर सलाह-मशविरा करने भी आते हैं। उसी को चौपाल कहते हैं।”
“पर ऐसी चौपाल तो इन्टरनेट पर भी होती है, इसके लिए आपको गाँव जाने की क्या जरूरत है? आप मेरे कम्प्यूटर की हेल्प से फेसबुक ज्वाइन कर सकते हो… आइए, मैं आपको दिखाता हूँ।” दादा जी का हाथ पकड़कर प्यार से सोनू उन्हें अपने कमरे में खींच ले गया। वहाँ उसने कंप्यूटर ऑन किया और ब्राडबैंड कनेक्ट करके फेसबुक खोल उन्हें दिखाते हुए बताने लगा- कैसे उसके दोस्त फेसबुक पर उसे ज्वाइन करते हैं, फिर आपसी बातें, गपशप आदि फेसबुक पर डालते हैं और एक-दूसरे को रिप्लाई करते हैं। जो ऑन लाइन होते हैं, वे हाथ के हाथ कमेण्ट देते हैं, जो ऑफ लाइन होते हैं, वे बाद में अपने कमेन्ट भेजते हैं। दादा जी इतने पढ़े-लिखे तो थे ही कि थोड़ा-बहुत समझ सकें। सोनू ने उन्हें चैट के बारे में भी बताया।
उन्हें आनन्द आता देख सोनू कहने लगा, “दादाजी मैं आपका एकाउन्ट भी फेसबुक पर बना देता हूँ, आप दिन में मेरे स्कूल से आने तक और जब भी आप अकेले हों, इस पर बिजी रह सकते हो।”
“लेकिन मेरे सारे दोस्त तो गाँव में हैं और उनके पास न तो कम्प्यूटर है, न इन्टरनेट। फिर मैं कैसे और किससे बतियाऊँगा?”
“आप बहुत सारे नए-नए दोस्त बना सकते हो दादा जी। आप तो टीचर रहे हो, नेट पर बहुत सारे टीचर्स भी मिल जाएँगे, उनसे अपने विषय पर बातें कर सकोगे। रही बात गाँव के दोस्तों की, सो उनसे मिलने तो महीने में एक-दो बार गाँव हो आया करो। और जो कम्प्यूटर खरीद सकते हों, उनसे कहना वे भी आपकी तरह फेसबुक ज्वाइन कर लें। वैसे अब तो स्मार्ट मोबाइल फोन भी आ गए हैं, उन पर भी फेसबुक चलती है।”
“पर मुझे तो ठीक से कम्प्यूटर और स्मार्ट फोन चलाना भी नहीं आता?”
“वो तो दादा जी, दो-तीन दिन में मैं सिखा दूँगा।”
‘“लगता है पापा जी, सोनू आपको परमानेन्टली रहने के लिए तैयार करके ही रहेगा।” ये सोनू की मम्मी रश्मि थी, जो पीछे से पूरा प्रकरण देख रही थी।
“लगता तो यही है, बहू!”
“इसका मतलब, आप मान गए दादा जी? कहते हुए सोनू दादा जी के गले में बाँहें डालकर लटक गया और उसने दादा जी के चेहरे पर चुम्मनों की बौछार कर दी।
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