जून 2026

देशहार-जीत     Posted: January 1, 2024

            मैं और सुरेखा जी एक ही रैंक के अधिकारी थे। मेधा और बुद्धि में कोई इक्कीस और बीस होता। सुरेखा जी मुझसे उन्नीस थीं; लेकिन वे स्वयं को मुझसे सुपीरियर ही मानतीं। मुझे आपत्ति नहीं होती; लेकिन जब उन्होंने सभी स्टाफ के सामने मुझे नीचा दिखाना चाहा, तो मुझे बुरा लगा। फिर तो ये हुआ कि वे निरंतर ऐसे षडयंत्र रचती रहतीं कि कैसे मुझे नीचा दिखा सकें। मैं बचाव करता और बच जाता। वे वरिष्ठ अधिकारियों से मिलकर अनावश्यक मुझे डाँट लगवातीं; लेकिन मेरा काम और निष्ठा से अधिकारी प्रभावित थे।

            जब उनका कोई तरीका नहीं चला, तो उन्होंने मेरे खिलाफ महिला उत्पीड़न का केस लगवा दिया। केस चला। साक्ष्य प्रस्तुत हुए। गवाहियाँ दी गईं। मैं निर्दोष साबित हुआ।

            तभी एक दिन वे मुझे मिलीं। मेरे केबिन में आईं और बोली, ‘मि. सुनील हमारे बीच बहुत कुछ चला। आप लगभग जीतते रहे।’ वे आगे और बोलती कि मैंने उन्हें रोक दिया था, ‘जो कुछ भी हमारे बीच चला वह दुखद था। नहीं होना चाहिए था। जीत हार का कोई मतलब नहीं।’

            ‘नहीं, मतलब है।’ उन्होंने मुझे रोका फिर आगे बोली थी, ‘लेकिन आप जीते भी तो किससे………एक औरत से।’

            मैं स्तब्ध, रह गया था और सिर्फ इतना ही बोला था, ‘सुरेखा जी मैं आपसे अब तक हारा या जीता ये तो मैं नहीं जानता लेकिन आज आप मुझसे हार गई।’

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