
उनकी बड़ी बहू एक कामकाजी महिला थी। दिन भर ऑफिस, आए दिन कामवाली की छुट्टी, सामंती पति के रुमाल देने से खाना परसने तक के ढेरों काम। उस पर तीन बरस के छोटे से बच्चे की देखभाल। कोई हँसी खेल था क्या? उनकी छोटी बहू पढी-लिखी तो बड़ी बहू से भी अधिक थी पर उसने अपने घर को प्राथमिकता दी थी ओर अपनी लगी-लगाई सरकारी नौकरी को वह पल में तिलांजलि दे आई थी, सिर्फ़ यही नहीं किया, उसने सुगृहिणी भी बनकर दिखाया।
बाहर का काम सिर्फ पति करता वह घर और बच्चों की देखभाल करती, समय पर खाना बनता, खाया जाता, बच्चे स्वस्थ व संतुष्ट रहते।
एक दिन बडी बहू छोटी के घर आई। बड़ी का बच्चा कुछ अनमना उदास सा लग रहा था, जबकि छोटी के बच्चे उसका हाथ पकड़-पकड़ कर अपने साथ खेलने का प्यार भरा आग्रह कर रहे थे। छोटी को बच्चे पर लाड आया और बोल उठी, “कैसा उदास लग रहा हे बेचारा बच्चा…” अभी इतना ही कहा था कि बड़ी वाली उस पर बरस पडी, बेचारा केसे हे ये हम भी तो जानें, हम क्या इसका ध्यान नहीं रखते? हम क्या इसके सौतेले हैं जो इसे प्यार नहीं करते?
तुम्हारी मजाल केसे हुई इसे बेचारा कहने की?”
जीजी में तो….” छोटी धीरे से बोली, पर बड़ी ने बीच ही में टोक दिया-“वैसे तुम इसके लिए कर क्या रही हो जो तुम्हें इसे बेचारा पुकारने का हक मिल गया, इसके पास तुम्हारे बच्चों से संख्या ओर कीमत दोनों में दुगुने खिलौने हैं, दस गुने महँगे कपड़े हैं। हमने इसे सबसे महँगे क्रच में डाल रखा है, आया रखी है। छह हजार रुपये महीने की। एक पल भी वो अकेला नहीं छोड॒ती इसे, अच्छे से अच्छा खाना बनाकर खिलाती है अपने हाथों से। क्रच की छुट्टी होने पर जब ये घर लौटता है, तो वो इसकी देखभाल सावधानी से करती है, और यह सब कन्फर्म करने के लिए हमने घर के हर कोने में सी सी टी वी कैमरे लगा रखे हैं, समझी तुम। आईं बड़ी बेचारा बोलकर सहानुभूति दिखाने वाली।’’।
अब तो छोटी को यकीन हो गया था कि वह नन्हा बच्चा वाकई बहुत बेचारा था।
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