
उस घर के सामने पार्क में एक लड़का रोज़ आता और पेड़ के नीचे खड़ा हो कर चार बजे का इंतज़ार करता। चार बजते ही उस घर की बालकनी में दूधिया से रंग की एक नाज़ुक सी लड़की आती ,कभी अपने बाल सुखाती, कभी वहाँ के गमलों में पानी देती और कभी अलगनी पर कपड़े फैलाती। लड़का प्रतिदिन नियम से आता। पेड़ के नीचे खड़ा होता और लड़की को देखता। यही सिलसिला कई हफ़्तों तक चला। अब उसके दोस्तों को भी इस लड़की के बारे में पता चल गया। अब अक्सर उसके दोस्त भी लड़के के साथ आते और सभी पेड़ के नीचे खड़े हो चार बजे की प्रतीक्षा करते। अब वह चुपचाप लड़की को नहीं देखता, लड़कों के कहने पर उसका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने की शालीन कोशिश भी करने लगा; पर लड़की अपना काम कर के चुपचाप चली जाती। यह सिलसिला भी बहुत दिनों तक चलता रहा। अब दोस्त उसको बात करने के लिए उकसाने लगे। कहने लगे कि कब तक यूँ दूर- दूर से देखेगा, जा न उससे बात कर ले। एक दिन लड़के ने बहुत हिम्मत की और सड़क पर कर उस इमारत के सामने पहुँचा और फाटक खोलकर अन्दर आ गया। लड़की अपनी बालकनी में अलगनी पर कपड़े डालने की तैयारी कर रही थी। लड़के ने देखा कि वहाँ तो अलगनी है ही नहीं। डोरी टूटकर ज़मीन पर गिरी पड़ी थी। लड़की इससे अनभिज्ञ रोज़ के अभ्यास से कपड़े डालने के लिए टटोलकर डोरी की तलाश कर रही थी। लड़के को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसकी इच्छा हुई कि ज़मीन पर गिरी डोरी को वापस बाँध दे, पर इस डर से कि उसकी मौजूदगी का एहसास होते ही लड़की डरकर चिल्ला ना पड़े, उसने यह विचार त्याग दिया। उसने आँख भरकर लड़की को देखा और उदास मन से वापस आ गया।
दोस्तों को बोला , “पास से देखने पर मुझे लड़की बिल्कुल नहीं जमी, बेमतलब समय ख़राब किया। अब कभी यहाँ नहीं आना है। चलो चलते हैं।” सभी वहाँ से चले गए।
यह कई दिन पहले घटा था।
ख़ास बात यह कि वह लड़की अभी भी रोज़ाना चार बजे बालकनी में आकर अपने रोज़ के काम करती है और वह लड़का भी प्रतिदिन पेड़ के नीचे खड़े होकर चुपचाप उसको निहारता रहता है….
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