गढ़वाली अनुवादः डॉ. कविता भट्ट
“साहब यु त मोरी ग्याई। बुरी तरौं फुके ग्याई सरील अर कार बि बिल्कुल अंगारू ही ह्वईं च। बणांग ई लगी होली।” कॉन्सेटबल रामलाल न अपड़ा इंसपैक्टर साब माँ हताश ह्वेकि बोली। भौत बुरी बदबू फैलीं छै मासू फुकेणै कि। वु बदबू का कारण बेहोश हूण वाळु छौ। फिर बि बड़ी हिम्मत कैरि क वेन जाँच कैरि।
“अरे पूछ दौं रामलाल आसपास का लोखु न कुछ देखि यूँन?” इसपेंक्टर साब न जोर कैरि क बोलि।
भीड़ म बिटि एक आदिम न बोलि। “सर कुछ क्या सबकुछ देखि। दस मिनट म त पूरी तरौं सि सब जळी क खारू ह्वे गी। हम पाँची यखि छा उबारी।”
“तुम क्य कन्ना छा पाँची यख। तुमुन कोशिश नी कैरि आग बुझौण की?”
“सर हम आग कन माँ बुझै सकदा छा?”
“त तुम सब्बि खडू ह्वे कि देखणा रैय्यां?”
“न सर हमुन वीडियो बणाई ना। अलग-अलग ऐंगल बिटि। आजकल भौत डिमांड च वीडियो की मीडिया माँ।”
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