जून 2026

देशसरहद     Posted: February 1, 2024

दोपहर ढलती तो नदी के एक किनारे एक आदमी आ बैठता, दूसरे किनारे दूसरा आदमी आ बैठता। दोनों एक दूसरे को देखते रहते। अँधेरा घिरने लगता तो दोनों उठते, एक दूसरे की ओर हाथ हिलाते और विपरीत दिशाओं में चल पड़ते।  नदी हैरान होती, बहुत बार दुखी भी कि आख़िर ये दोनों उसे पारकर आपस में मिलते क्यों नहीं? कई बार तो वह अपने विस्तार को इतना समेट लेती कि उसमें घुटनों भर पानी रह जाता, फिर भी वे दोनों किनारों पर ही बैठे रहते।  कभी-  कभी वे एक दूसरे से पूछते भी- कैसे हो भाई?

          बस इतना ही, इसके अलावा वे कुछ नहीं बोलते।  नदी इतना तो जान गई थी कि ये दोनों भाई हैं, पर यह नहीं जान पाई कि दोनों भाइयों के देश अलग-  अलग हैं, दोनों पड़ोसी देश आपस में दुश्मन हैं और वह ख़ुद दो देशों के बीच की सरहद है।  एक दिन दोनों भाइयों को उनके देशों की फ़ौज ने देशद्रोह के आरोप में उठाकर जेल में डाल दिया।  जेल में पहला सोचता- भाई अब भी नदी किनारे आता होगा, मेरा इन्तज़ार करता होगा और मायूस लौट जाता होगा।  दूसरा भाई भी ठीक ऐसा ही सोचता।  नदी को उन दोनों की उपस्थिति की आदत हो गई थी।  उन्हें वहाँ न देख, नदी उदास हो गई।  जैसे-  जैसे दिन बीते, उसकी उदासी गहराती गई।  वह रोती, पर उसके आँसू किसी को न दिखते।  एक दिन उसकी उदासी क्रोध में बदल गई।  बेक़ाबू उफनती नदी ने दोनों तरफ़ के किनारे तोड़ डाले।  पत्थर टूट-  टूटकर नदी में गिरने लगे, पक्षियों की भयावह चीख़ें हवा को कँपाने लगीं।  कुछ देर बाद थकी नदी इतनी धीमी और शांत बह रही थी, जैसे उसका वेग हमेशा के लिए विलुप्त हो गया हो।  अब नदी के चौड़े पाट के दोनों तरफ़ भीगे पत्थर थे, पत्थरों पर पक्षियों का हुजूम था और सब चुप थे।

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