
पंडित जी मिले, बड़े दुःखी थे। बोले, “इतने बिहारी पुरबिये आ गए। पाँच- पाँच सौ में ब्याह पढ़वा देते हैं। दो सौ रुपये दक्षिणा दो, हवन कर देते हैं। न मुहूर्त का ज्ञान है, न मंत्रों की शुद्धता का। हमारे भूखों मरने के दिन आ गए। एक्टिवा के तेल का पूरा न पड़ता।”
मैं भी उनके दुःख में दुखी हुआ।
सहानुभूति पाकर थोड़ा और खुले,बोले, “धर्म भ्रष्ट होने का ख़तरा मँडराता रहता है वह अलग। एक अपार्टमेंट में गृह- प्रवेश का हवन करने गया था। पति और पत्नी दोनों एक दूसरे से ज्यादा सुंदर। गोदी में उससे भी सुंदर बच्चा। पहुँचते ही उन्होंने बड़े भक्ति भाव से चरण स्पर्श किए। मन बड़ा प्रसन्न हुआ। नई पीढ़ी के मन में गौ ब्राह्मण का इतना सम्मान। जरूर संस्कारी माता पिता की संतान होंगे,खैर।”
“पूजा शुरू की मैंने गृहस्वामी का नाम पूछा,दोनों चुप। मैंने उनके मुँह की तरफ देखा। मन में शंका हुई। “बता दो,मंत्र में बोलना होता है,नाम और गोत्र।”
वो दोनों एक दूसरे की तरफ देख रहे। बच्चे की तरफ देखते हुए बोले, “इसका बोल दो,दीपक!”
और गोत्र?
अली
?????
जी!
आप?
वंदना!!
शिव शिव !मन तो हुआ हवन बीच मे छोड़कर खड़ा हो जाऊँ: लेकिन यज्ञ- भंग का पाप पुरोहित के सिर पर भी तो लगता है।
लेकिन जजमान अच्छे थे। दक्षिणा भी पूरे दो हजार दी।
खाना भी शुद्ध घी में बना था।
मन प्रसन्न हो गया।
“आपने म्लेच्छ के घर का खाना खा लिया?”- मैंने आश्चर्य से पूछा ।
“पके खाने में दोष नहीं लगता!जल ग्रहण नहीं किया!”
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