जून 2026

देशचिनक     Posted: February 1, 2024

चाहे लेटने की स्थिति में रहें या बैठने की, शर्माजी का बदन जरा भी हिला या कोण जरा भी बदला नहीं कि  रीढ़ की हड्डी व पसलियों में दर्द बिच्छू सा डंक मार उठता है।   

कल  ‘आरक्षण विरोधी मंच’ की प्रतिवाद सभा थी।  एससी एसटी और ढेर सारी ‘अन्य जातियाँ’ तो पहले से ही सिर पर तांडव मचा रहीं, अब कई नई जातियों को ओबीसी की जद में लाने की सनक।  उपेक्षितों व कमजोरों को न्याय मिलना चाहिए.. हंह ! ये कैसा न्याय जो हमारे नौनिहालों का हक छीनकर दिया जाय, वाह !

अध्यक्षीय भाषण देते हुए नई आरक्षण नीति से बुरी तरह तिलमिलाया मन ! उत्तेजना से प्रत्यंचा सी तनी शिराएँ ! तभी दर्द का झटका आया था।  लड़खड़ाकर गिर ही जाते यदि हाथों से माइक की गर्दन को दबोच न लिया होता।  भाषण पूरा किये बिना ही लौटना पड़ा।  घर आकर निढाल से बिस्तर पर ढह गए।  उसके बाद..  रात भर पांच छः बार बाम मलने और गर्म सेंक करने के वावजूद सुबह स्थिति में कोई फर्क नहीं आया।

 क्या करना चाहिए ! दिमाग तेजी से विकल्पों को खँगाल रहा है।  डॉक्टर के पास गए तो दसियों तरह के टेस्ट और एनल्जेसिक पेन किलर लिख देगा।  योगा की कठिन साधना उनके वश की नहीं।  एक शंका फुफकारी कि दर्द कहीं साधारण चिनक न होकर, आरक्षण की पिनक का साइड इफ़ेक्ट तो नहीं।  

‘चिनक में उल्टे जन्मे बच्चे का पाँव छुआने से तुरंत लाभ मिलता है।  पड़ोस के सुगनचंद नेवगी (नाईं) का छोटका छोरा पांव की ओर से जन्मा था तीनेक साल पहले। ‘

गिन्नी के सुझाव से सुकून से भर जाता है मन।  सुगनचंद को फोन लगाकर पहले छोरा के उल्टे जन्मने की बात कंफर्म करते हैं, फिर हुकुम दनदनाते हैं-   ‘छोरा ने लेकर तुरन्त घर आ जा रे सुगना।  कमर में चिनक आ गई।  पैर छुआना है। ”

‘इभी तो इस्कूल में है पंडीजी।  बारह बजे टिफ़िन होते ही नेवगिन (नाईन) ले आवेगी। ‘

‘एक दिन में ही कोण सा बलिस्टर बन जाएगा ससुर।  बहुत दर्द हो रहा।  तुंरत ले आ। ‘ लहजे में तल्खी घुल जाती है।  छोरा को बीच मे स्कूल से लाने की बात जंचती नहीं सुगन को।  ‘थोड़ी देर की तो बात ह’ कहकर फोन रख देता है।  शर्माजी फनफना उठते हैं..  कल तक जो नजर उठाकर बात नहीं करते थे, आज आज्ञा की अवहेलना कर रहे।  आरक्षण ने तो धर्म-  कर्म का विनाश ही कर दिया !!

एक बजे नेवगिन छोरे को लिए कोठी पर आती है।  आक्रोश को जज्ब करते शर्माजी पलंग पर औंधे झुक जाते हैं।  नेवगिन छोरे को पलंग पर खड़ा करके उनकी पीठ से पांव छुआने लगती है।  शर्माजी की अधमुंदी पलकों में एक कोलाज़ कौंधता है.. कमर और पीठ अहिल्या की तरह पथराई हुई है ! उद्धार के लिए कोई आगे बढ़ रहा है ! आंखें फाड़कर देखते हैं।  अरे शम्बूक..! आईपीएस अफसर की कड़कदार वर्दी में !!

लिजलिजी सवर्णी दम्भ से तिलमिला जाते हैं।  दर्द अप्रत्याशित रूप से स्खलित !! पर दम्भ रोकते रोकते भी चींख बनकर गूगली सा बाहर उछल आता है-   ‘छोरा ने कपाल स उतारेगी भी इब..या न्यू ही खड़ा रखेगी, आंय !’

नेवगिन हड़बड़ाती बच्चे को नीचे खिंचना चाहती है कि चींख से सहमे बच्चे को मूत रिस जाता है।  पलंग पर नम वृत्त ! बृत्त को घूरते हुए शर्माजी का जेहन साँय-   साँय करने लगता है।  

वृत्त पलँग से उठकर घुमेरे घालता आँखों की राह फिर से कमर पर आ बैठता है।

-0-

गतिविधियाँ

  • सम्पर्क:-

    सुकेश साहनी

    185,उत्सव,महानगर पार्ट–2
    बरेली–243122 (उ.प्र.)


    sahnisukesh@gmail.com

    रामेश्वर काम्बोज ´हिमांशु´

    रचनाएँ भेजने के लिए ई-मेल-:-

    laghukatha89@gmail.com

    विशेष सूचना-:-

    पूर्व अनुमति के बिना लघुकथा डॉट कॉंम की सामग्री का उपयोग नहीं किया जा सकता ।

    केवल स्वीकृत रचनाओं की ही सूचना दी जाती है।

    -सम्पादक द्वय

Design by TemplateWorld and brought to you by SmashingMagazine