
“पापा! एक चॉकलेट ले लूँ?”
मॉल में एक प्यारे से बच्चे की आवाज़ ने हमारा ध्यान खींचा।
“बेटा! बताया था ना…चॉकलेट से दाँत खराब हो जाते हैं।” बच्चे के पिता ने इनकार करते हुए उसे समझाया।
“ओ के पापा।” उसने मन मसोस लिया।
“पापा मैं ये गुब्बारे ले लूँ?” रंग- बिरंगे गुब्बारे देखकर उसकी आँखों में चमक उभरी।
“मिडिल क्लास बच्चों जैसी बातें मत करो तुम। अभी दो मिनट में इन्हें फोड़ लोगे। क्या फायदा ऐसी चीजों का?” पिता ने फिर टाल दिया।
“ओ के पापा।”- उसकी आँखों में उतरी चमक बुझ गई।
“पापा…! वो फ्ल्यूट और डमरू! कितना मजेदार खेल जमेगा। मैं और दीदी खूब खेलेंगे।” वह उछला।
“नो बेटा! आई थिंक दिस इज नॉट गुड फॉर यू।”
“ओ के पापा।” काफी दूर तक उसकी हसरत भरी निगाहें ताकती रही।
“लुक हियर! यह ‘लेगो गेम’ तुम्हारे खेलने के साथ ब्रेन डवलपमेंट के लिए भी अच्छा है।” पापा ने एक बड़े से डिब्बे में पैक मँहगा गेम उसके हाथ में थमाया।
“थैंक्यू सो मच पापा।” बच्चे ने बिना कोई ऐतराज किए गेम ले लिया।
मुझे उसके चेहरे पर जरा भी खुशी नहीं दिखी।
“देखो जी! कितना सभ्य, संस्कारी और आज्ञाकारी बच्चा है। बिल्कुल जिद नहीं करता। हमारे बच्चे तो…।” मेरे साथ उस बच्चे की गतिविधियों को देख रही मेरी पत्नी ने कहा।
“हाँ! आज्ञाकारी या ‘सभ्य’ तो कह सकते हैं, मगर यह ‘बच्चा’ तो बिल्कुल नहीं लग रहा।”
मेरी बेटी ने आइसक्रीम से सने हाथ अपनी फ्रॉक से पोंछ लिये थे।
“अच्छे से नहीं खा सकती…”- पत्नी ने डपटना चाहा, मगर मैंने उसे गोद में उठाकर चूम लिया।