जून 2026

पुस्तकमेरी पसन्द – भाग 5 लघुकथा-विमर्श     Posted: April 1, 2024

मेरी पसन्द – भाग 5 लघुकथा-विमर्श का संकलन है, जिसमें  36 प्रबुद्ध लघुकथाकारों ने अपनी पसन्द की दो-दो लघुकथाओं पर विस्तृत शोध रूपी प्रस्तुति दी है। चूँकि सभी लघुकथाकारों की पसन्द एक-सी नहीं हो सकती, तो स्पष्ट है कि लघुकथाओं के चयन में कुछ भाव प्रधान, कुछ समाज प्रधान, कुछ मनोविज्ञान प्रधान और कुछ बिम्ब प्रधान रचनाएँ होंगी। ये चयनित लघुकथाएँ विशिष्ट श्रेणी के चमकदार मोतियों के समान ही पाठकों के मन मस्तिष्क को सुरम्य आभा से भर देंगे। पाठकों को सोच का अतिरिक्त बोझ महसूस नहीं होगा; क्योंकि विस्तार लघुकथाकारों द्वारा प्रस्तुत किया जा चुका है। वे अर्थ के अनुसार सहज ग्राह्य बन चुके होते हैं। ऐसे में यह पुस्तक लघुकथा शोध के लिए अत्यंत लाभकारी होगी। पुस्तक की समीक्षा, एक प्रकार से लघुकथाकारों की समीक्षा होगी कि उनकी पसन्द से उनके लेखन या व्यक्तित्व की कौन सी विशिष्टता सामने आती है।

कपिल शास्त्री ने सुभाष नीरव की लघुकथा, ‘सफर में आदमी’ एवं बलराम अग्रवाल की ‘बिना नाल का घोड़ा’ लघुकथाओं पर लिखा। दोनों ही लघुकथाएँ बेबसी की परिचायक हैं। एक ओर एक आम आदमी है जो ट्रेन के खास डब्बे में सफर कर सकता है, पर बेबसी में जनरल बॉगी में सफर करता है। दूसरी ओर घर को चलाने का बोझ लिये घर का मुखिया है, जिसके पास सुरक्षा रूपी नाल  नहीं, उसे खटते जाना है बिना नाल के, चाहे तलवे लहूलुहान क्यों न हो जाएँ।

मेघा राठी  ने सुकेश साहनी एवं जानकी वाही  की लघुकथाएँ ली हैं। दोनों ही लघुकथाएँ कुछ स्पष्ट न कहकर शब्दों की रजाई ओढ़े हैं। रजाई से मुँह ढककर समझा जाए, तो घबराहट, बाहर झाँका जाए समाज की विद्रूपता झलकती है। 

अनिता मण्डा  की लेखनी डॉ. सुषमा गुप्ता  की लघुकथा पर भावपूर्ण शब्दों के साथ चली। खलील जिब्रान की लघुकथा उत्कृष्ट और प्रेरक है ही, शिल्प ध्यान आकृष्ट करता है।

अनघा जोगलेकर  ने रवि प्रभाकर  एवं सुषमा गुप्ता  की  लघुकथाएँ बिंब की प्रधानता लिये समाज की सच्चाई को प्रेषित करने में समर्थ हैं। आज के समाज में स्वयं को स्थापित करना बहुत बडी चुनौती बन चुकी है। इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है। भेड़चाल को अपनाते हुए लोग यह नहीं मानते कि वे बेवकूफ़ बन रहे। अनघा  का लघुकथा- चयन वाकई उत्कृष्ट है। दोनों कथाओं के शिल्प सीखने लायक हैं।

रोचिका शर्मा ने एक पुरानी और एक समकालीन लघुकथा ली। एक भारत-पाक सीमा पर शंका और विश्वास के ऊहापोह पर आधारित है, जिसे पढ़ते हुए पवन, पंछी और खुशबू की याद आती है, जिन्हें कोई बाँध नहीं सकता। दूसरी लघुकथा में दरिंदगी की पराकाष्ठा है, जो दहेज की विद्रूपता से उत्पन्न हुई है। यह कथा शिल्प के लिए अवश्य एक उदाहरण है।

दिव्या शर्मा ने चंद्रेश कुमार छतलानी  और मेघा राठी  की लघुकथाएँ ली हैं। दोनों कथाएँ बिंब प्रधान हैं। एक कथा थोड़ी व्यंगात्मक है। वहाँ धरती काली पड़ चुकी है, इसलिए वह वह दाँव पर नहीं लग सकती, तो इस तरह की कथा थोड़ी स्त्री विमर्श की बनती हुई पर्यावरण की ओर भी संकेत करती है। बिंब के रूप में सूरज सितारे लिये गए हैं। दूसरी लघुकथा मेघा राठी  की जिसमें विषय सास बहू का ही है; किंतु प्रस्तुत करने का अंदाज थोड़ा अलग है। मदारी के रूप में सास को दिखाना मुझे थोड़ा अधिक लग रहा है। विवाह के बाद एक सहज सोच होती है कि लड़कियाँ एक बहू के रूप में भी अपनी जिम्मेदारी निभाएँ। जब रिश्ते नए मिलेंगे, तो नई जिम्मेदारियाँ भी होंगी और इसके लिए हमेशा सास को कटघरे में रखना मेरे विचार से सही नहीं है। छोटी-छोटी बातों पर विद्रोह करना कई बार परिवार के विघटन का कारण बन जाता है। इसके अतिरिक्त यदि सास को मदारी कहा गया है , मतलब अकथित रूप से बहू बंदरिया है और नई बंदरिया को साधने के लिए थोड़ा मदारीपना तो दिखाना ही पड़ेगा, किंतु मुझे इस विषय पर नहीं जाना है। 

अंजू खरबंदा की पसन्द बनीं डॉ. कविता भट्ट  एवं डॉ. सुषमा गुप्ता  की लघुकथाएँ। पढ़ी- लिखी स्त्री को आज भी पुरुषों की अभद्र  दृष्टि का सामना करना पड़ता है। डॉ. सुषमा गुप्ता  की लघुकथा में बताया गया कि आज के समाज में रहने के लिए अपने संस्कारों का त्याग करना कुछ की मजबूरी बन चुकी है। लघुकथाएँ सोचने का चिंतन दें, यह मुख्य घटक होता है। ।

            रामकरण  ने चितरंजन गोप  एवं मार्टिन जॉन की लघुकथाएँ ली हैं। ‘परिवार के सदस्य’ में परिवार के नाम पर एक छोटे से परिवार में रहने वाले बच्चे बस दो या तीन को ही जानते हैं, लेकिन अंत में बालिका प्रकृति ने अपने परिवार में मानव सदस्यों के साथ-साथ जिस तरह से गाय तोता और पेड़ों को समेटा, वह वाकई बेमिसाल है। अब आते हैं जॉन मार्टिन की लघुकथा डिजिटल स्लेव पर, इसमें आधुनिक डिजिटल जमाने का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है। आज मनुष्य के पास घर बैठे ही सब कुछ उपलब्ध हो जाता है। इससे बाहर निकालने की प्रक्रिया पर रोक लग गई है। वन में सब कुछ मिल जाना ही पर्याप्त नहीं होता है, उसके अलावा बाहर निकलकर लोगों से मिलना-जुलना मानसिक स्वच्छता और मनोरंजन के लिए अति आवश्यक हैं।

ज्योति जैन  ने सतीश दुबे  की कहानी ‘संस्कार’ और चित्रा मुदगल  की ‘दूध’ को लिया है। ‘संस्कार’ के बारे में बस यही कहना है शिल्प सुन्दर है। यह दुखद है कि स्त्री को इसे पेशा के रूप में  अपनाना पड़ता है। यह समाज की असफलता है। भगवान को कपड़े से ढककर अमान्य को मान्य स्वीकार नहीं किया जा सकता है। भगवान तो कण-कण में हैं।  ‘दूध’ लघुकथा का औचित्य हमें कुछ पीछे ले जाता है, जब लड़कियों को खाने पीने में भी बंदिशें झेलनी पड़ती थीं। आज के संदर्भ में बेटा-बेटी में समानताएँ दिखने लगी हैं। आज की बेटियाँ काम के क्षेत्र में भी आगे बढ़ चुकी हैं और माता-पिता भी सहयोग दे रहे। यदि कहीं किसी मासूम बेटी को यह झेलना पड़ रहा है, तो यह वाकई दुखदायी है। कथा की अंतिम पंक्ति को और अच्छे से सांकेतिक रूप में लिखा जा सकता था। यह नासमझ माँ और विद्रोही बेटी का झगड़ा बन कर रह गया है।

डॉ.उपमा शर्मा  ने रामेश्वर कांबोज हिमांशु  की लघुकथा ‘ऊँचाई’ ली है। यह बहुचर्चित लघुकथा है। उनके पसंद की दूसरी लघुकथा विरेंद्र वीर मेहता  की ‘दिन अभी ढला नहीं’ है। उपमा  के चयन में सकारात्मकता का भाव स्पष्ट है । दोनों ही लघुकथाएँ विघटन से अधिक संगठन का विमर्श दे रहीं हैं। दोनों लघुकथाओं में सिर्फ समस्या नहीं, समाधान भी है। उपमा  का चयन उत्कृष्ट है।

सदानन्द कवीश्वर  के द्वारा चयनित दोनों लघुकथाओं में रिश्तों का विघटन दिखाया गया है। जुड़ाव व अलगाव, कर्तव्य व स्वाभिमान, इस विरोधाभास के साथ चलती हुई दोनों लघुकथाएँ बहुत अच्छी हैं।

सारिका भूषण  द्वारा चयनित लघुकथाओं में बेबसी की झलक मिलती है। पहली लघुकथा में उम्र और पीढी के बदलाव का है, तो सुभाष नीरव  की लघुकथा वास्तविकता के बेहद करीब है।

हरभजन चावला  ने वीरेंद्र भाटिया  एवं सुरेश बरनवाल  की लघुकथाओं में सकारात्मकता है। जो कृति मन को प्रेम से भर दे, खुशी से आनन्दित कर दे वह प्रभावकारी होती है।

अनिमा दास  की पसन्द की  सार्थक, सारगर्भित लघुकथाओं  में से एक में पर्यावरण को और दूसरी में बालमनोविज्ञान को महत्त्व दिया। ये लघुकथाएँ उमेश महदोषी  एवं डॉ. उपमा शर्मा  की हैं।

चंद्रेश कुमार छतलानी  ने भी स्थापित लघुकथाकार की बहुचर्चित लघुकथा ‘ऊँचाई’ ली दूसरी लघुकथा विदेशी लेखक कार्ल सैंडबर्ग की है। सभी लघुकथाकार उस स्तर तक नहीं पहुँच सकते हैं; लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनकी रचनाएँ प्रभावी नहीं। यही कहना चाहूँगी कि जैसा देश और परिवेश, उसी अनुसार रचनाओं का चयन करके अपना मन्तव्य रखना उचित है।

डॉ.योगेन्द्रनाथ शुक्ल  ने लिखा है कि श्रेष्ठ साहित्य वही होता है, जो जन जागृति कर सके। उन्होंने अश्क  एवं एक अन्य भाषा के विदेशी लघुकथाकार कार्ल सैंडबर्ग की रचना ली है। अपने देश के लेखक की कृतियों का चयन मेरे ख्याल से अधिक उचित रहता। अश्क  की ‘गिलट’ प्रभावी रचना है। ‘रंगभेद’ भी अच्छी लघुकथा है।

वीरेंद्र भाटिया  ने हरभजन चावला  एवं सुरेश बरनवाल  की लघुकथाओं को लिया है। संयोग भी आश्चर्यचकित

नन्दा पांडेय ने सत्या शर्मा कीर्ति  की लघुकथा ‘फटी चुन्नी’ में  एक नाबालिग बच्ची ने चुप रहकर जाने कितना कुछ कह दिया और कितना कुछ बचा लिया । एक तरफ रिश्ते के पिता समान पुरुष की ज्यादती, दूसरी ओर माँ द्वारा अपनी ननद को न पसन्द किया जाना।  दूसरी कथा सारिका भूषण  की है। थोड़ा ‘स्पेस’ सभी को मिलना चाहिए। सहज आकर्षण को सिरे से नकार देने की सुन्दर लघुकथा है। 

जयमाला  का एक चयन जहाँ सहनशीलता और धैर्य की ताकत का महत्त्व बता रहा, वहीं दूसरी लघुकथा अधैर्य की है। ये अंतोन चेखव और विष्णु नागर  की लघुकथा है। 

रजनीश दीक्षित  द्वारा चयनित लघुकथाएँ ‘मायका’ और ‘वाई क्रोमोजोम’ बहुत ही अच्छी हैं। संकेत में सब कुछ कह देने वाली दोनो लघुकथाएँ बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती हैं।

छवि निगम  ने भावपूर्ण लघुकथाओं को समेटा है। माधुरी महलवाला  की ‘सामंजस्य’ जहाँ आधुनिक पीढ़ी की समझदारी इंगित कर रही वहीं प्रियंका गुप्ता  की ‘भूकंप’ पुरानी पीढ़ी की सहृदय सोच एवं नवीन पीढ़ी की स्वार्थी सोच अंकित कर रही।

पूनम कतरियार  ने डॉ. सतीश राज पुष्करणा  की लघुकथा, बेबस विद्रोह और रवि प्रभाकर  की लघुकथा ‘मुर्दों का शहर’ ली हैं। बेबस विद्रोह जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि एक बेबस चुपचाप ही अपना विद्रोह दिखा सकता है। इस तरह की घटनाएँ घरों में देखने को मिल जाती हैं। वह काम छोड़कर जा सकती थी; इसलिए चली गई किंतु इस तरह के अत्याचार जब घर की स्त्री पर होते हैं, तो वह यह विद्रोह नहीं कर सकती, वह और अधिक बेबस होती है। ‘मुर्दों का शहर’ मानवेतर लघुकथा है और वह इंसानों पर व्यंग्य कर रही है।

 रश्मि विभा त्रिपाठी  के ने विस्तृत समीक्षा की है और उनकी लघुकथाओं में डॉ. सुषमा गुप्ता  की ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ और डॉ. कविता भट्ट  की ‘गाइड’ है। यह एक लोकप्रिय लघुकथा है। ‘ब्रेकिंग न्यूज’ वीडियो बनाने के प्रचलन को लेकर कही गई है। यह एक कटाक्ष करती हुई अच्छी लघुकथा है।

 अश्विनी कुमार आलोक  ने  सुकेश साहनी  की ‘ठंडी रजाई’ को चुना है। यह बहुचर्चित मर्मस्पर्शी लघुकथा है। दूसरी लघुकथा युगल  की ‘गरीबी और रेखा’ है। चयन में एक लघुकथा समाधान भी लेकर चली है और दूसरी सिर्फ समाज को आईना दिखा रही है। 

 मधु जैन  ने जो दो कथाएँ पसन्द कीं, वे  हैं –सुकेश साहनी  की ‘कुत्ते वाला घर’ और श्याम सुंदर अग्रवाल  की ‘माँ का कमरा’। विस्तृत समीक्षा है और कथा के हर पहलू पर ध्यान रखा गया है।

मुकेश कुमार मृदुल  की दोनों लघुकथाएँ पारिवारिक हैं। दोनों ही लघुकथाएँ बेहद मर्मस्पर्शी हैं। कभी-कभी माता-पिता से भी कोई भूल हो जाती है और प्रेषित करने का समय नहीं मिलता, तो वह कसक पैदा करती है। सुंदर चयन है।

राजेंद्र मोहन त्रिवेदी ‘बंधु’  की लघुकथाएँ बालमनोविज्ञान पर आधारित हैं। दूसरी लघुकथा में बहुत सुंदर बात कही गई है। जिनका पेशा एक हो, उनकी जाति भी एक ही मानी जानी चाहिए। उसे धर्म या मजहब से जोड़कर देखना सही नहीं। दोनों लघुकथाओं का चयन सकारात्मक है और यह बहुत अच्छी बात है।

पवन जैन  ने जिन लघु कथाओं का चयन किया है, वे है बहुचर्चित लघुकथा रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’  की  ‘ऊँचाई’ दूसरी कांता राय  की लघुकथा है। ‘ऊँचाई’ लघुकथा के बारे में पहले भी बहुत सकारात्मक बातें कही जा चुकी हैं। कांता राय  की लघुकथा में आजकल के मल्टीनेशनल जॉब और महानगर पर अच्छा कटाक्ष है। दोनों कथाएँ माता-पिता की हैं, जो बच्चों को आर्थिक तंगी में देखते हुए उनकी मदद करते हैं। दोनों ही लघुकथाएँ एक ही बात कह रही हैं और यह संदेश देना चाहती हैं कि अपनी संतान के लिए जीवन भर खड़े रहना होगा। दोनों लघुकथाएँ सकारात्मक है और दोनों कथाएँ एक साथ पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि कांता राय  की लघुकथा रामेश्वर काम्बोज हिमांशु  की लघुकथा से प्रेरित है।

अनीता सैनी दीप्ति ने कार्ल सेंड वर्ग की कथा ‘रंगभेद’ और चित्रा मुदगल  की लघुकथा ‘दूध’ को लिया

भीकम सिंह  ने राजनीति पर आधारित लघुकथाएँ चुनी हैं। एक में दंगे के बाद शवों के बीच मजहब ढूँढा जा रहा और एक लघुकथा में दंगों के दौरान होने वाली कशमकश की बात कही गई है। ये लघुकथाएँ स्थापित लघुकथाकार सुकेश साहनी  एवं डॉ.कमल चोपड़ा  की हैं।

कुणाल शर्मा  की पसन्द की लघुकथाओं  में दो समझदार नवयुवकों की कथा है। एक युवक जो दामाद है , वह समझ रहा कि भारतीय परंपरा में दामाद की खातिरदारी में कोई कोर कसर नहीं रखी जाती और इसके लिए उधार भी क्यों न लेना पड़े। दूसरी लघुकथा ‘कथा नहीं’ पृथ्वीराज अरोड़ा  की है, जिसका युवक एक पुत्र है। वह पिता  के लिए बहुत कुछ करना चाहता है; किंतु उसके पास साधन नहीं। 

सीमा वर्मा  ने कांता  की लघुकथा, ‘साख बच गई’ व महेश वर्मा  की लघुकथा ‘ नेटवर्क’ है । दोनों लघुकथाएँ  प्रसिद्धि की चाहत की ओर इंगित करती हैं। सत्य को समझने का संदेश प्रेषित करती दोनो कथाएँ सुन्दर हैं।

अशोक दर्द  की लघुकथाओं का चयन दर्द की दास्तान है। एक शिक्षक को अन्य कामों में जुटा कर रखे जाने का दर्द, एक नवीन पीढ़ी के युवक को अपने देश के बेरोजगार युवकों का दर्द है। समाज को आईना दिखाती हैं ये  लघुकथाएँ।

ब्रजेश कानूनगो  द्वारा चयनित दोनों लघुकथाएँ विचारों को आंदोलित करने वाली हैं। चैतन्य त्रिवेदी  की ‘समर्पण’ एवं विष्णु नागर  की ‘दोषी कोई नहीं’ समाज और राजतंत्र को चित्रित करती लघुकथाएँ हैं। 

डॉ. रत्ना वर्मा  की पसन्द की  लघुकथाएँ सत्य को उजागर करने वाली मार्मिक, हृदयस्पर्शी हैं। उनकी लघुकथाओं में डॉ. सुधा गुप्ता  की लघुकथा ‘कन्फेशन’ है, जो वन में सही और नेक राह पर चलते हुए इंसान कि स्वीकारोक्ति है कि यह रास्ता दर्द और छलावे के अतिरिक्त कुछ नहीं देता। सुभाष नीरव  की लघुकथा ‘कबाड़’ में ‘कमरा ‘को लेकर बेटे द्वारा लिया गया निर्णय सोचने पर मजबूर करता है कि सास- ससुर के साथ हुई नाइंसाफी में हमेशा बहू का ही हाथ नहीं होता। बेटे अधिक जिम्मेदार होते हैं।

            सकारात्मक तथ्य ये रहे कि इस आयोजन से लघुकथा के लिए आवश्यक शिल्प, कथ्य, सदेश सम्प्रेषण , सहजता, भाषा विचार, बिम्ब, सकारत्मकता आदि कई पहलू एक स्थान पर समायोजित हुए। इस जगत में प्रवेश करने वाले नवोदित लघुकथाकारों को इससे अवश्य लाभ मिलेगा।

-0- लघुकथा डॉट कॉम: मेरी पसन्द -5 (लघुकथा -विमर्श),सम्पादकः सुकेश साहनी, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

प्रथम संस्करण – 2024, मूल्यः 525 रुपये ( सज़िल्द), पृष्ठ:192,  प्रकाशक: अयन प्रकाशन, जे – 19/ 139, राजापुरी, उत्तम नगर, नई दिल्ली– 110059

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